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corruption virus:बंटाधार की हुआ शपथ, पार्षदों का भ्रष्टाचार का वायरल वीडियो खोल रहा व्यवस्था की पोल, पढ़िए क्या है भ्रष्टाचार का नायाब सिंडिकेट

corruption virus: भारतीय लोकतंत्र की सबसे बुनियादी इकाई कहे जाने वाले स्थानीय निकाय किस कदर सड़न और दीमक का शिकार हो चुके हैं, इसकी बानगी..

corruption virus:बंटाधार की हुआ शपथ, पार्षदों का भ्रष्टाचार
भ्रष्टाचार का नायाब सिंडिकेट- फोटो : social Media

corruption virus: भारतीय लोकतंत्र की सबसे बुनियादी इकाई कहे जाने वाले स्थानीय निकाय किस कदर सड़न और दीमक का शिकार हो चुके हैं, इसकी बानगी उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर (नगर परिषद/निकाय) से सामने आए एक वायरल वीडियो ने दे दी है। सोशल मीडिया पर वायरल इस वीडियो में पार्षद गोल घेरे में खड़े होकर हाथ में जल लेकर कसम खाते दिख रहे हैं कि वे भ्रष्टाचार और ऊपरी कमाई  के बंटवारे में पूरी ईमानदारी बरतेंगे।वीडियो में के दृश्य सिर्फ लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उपहास नहीं है, बल्कि उस दुस्साहस को बेनकाब करता है जिसके तहत भ्रष्टाचार अब संगठित अपराध की तरह एक सिंडिकेट बन चुका है। जिन प्रतिनिधियों को जनता की सेवा और विकास कार्यों की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, वे जनता के हक पर डाका डालने के लिए आपसी ईमानदारी की कसमें खा रहे हैं। यह घटना समाज के उस पातन को दर्शाती है जहाँ जाति, धर्म और संकीर्ण स्वार्थों के चलते हम खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारकर गलत लोगों को चुन लेते हैं।

सादगी की सियासत से करोड़पति-अरबपति जनप्रतिनिधियों तक

देश की आज़ादी के शुरुआती दौर और आज की राजनीति में ज़मीन-आसमान का फर्क आ चुका है। इतिहास गवाह है कि आज़ादी के बाद राजस्थान में एक ऐसा विधायक भी चुना गया था जिसके पास जयपुर जाकर शपथ लेने तक का किराया नहीं था, और जनता ने चंदा इकट्ठा कर उसे भेजा था। इसके उलट, आज हमारी विधानसभाओं और संसद में सैकड़ों करोड़पति और अरबपति जनप्रतिनिधि भरे पड़े हैं। आंकड़ों के गवाह हैं कि जनप्रतिनिधि बनने के बाद नेताओं की संपत्ति दिन-दोगुनी और रात-चौगुनी रफ्तार से बढ़ती है। चुनाव आयोग को दिए जाने वाले शपथ-पत्रों में यह बढ़ोत्तरी साफ़ झलकती है, जो देश की बढ़ती आर्थिक विषमता और राजनीतिक लूट का खुला दस्तावेज है।

प्रशासनिक उदासीनता और लीपापोती की संस्कृति

हैरानी की बात यह है कि ऐसे गंभीर मामलों में भी शासन-प्रशासन की तरफ़ से सिर्फ़ लीपापोती की जाती है। वायरल वीडियो सामने आने के बावजूद जिला प्रशासन ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं हुई है।

सवाल है कि क्या प्रशासन को भ्रष्टाचार के इतने बड़े सबूत पर खुद संज्ञान लेकर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए? क्या दल-विशेष और विपक्षी नेता सिर्फ़ अपने राजनीतिक नफे-नुकसान के इंतज़ार में बैठे रहते हैं? आम जनता तब तक आवाज नहीं उठाती जब तक वह खुद पीड़ित न हो, और कई बार इस लूट को सुविधा शुल्क कहकर सामान्य मान लिया जाता है।

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जब तक समाज इस भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट होकर कड़ा प्रतिरोध दर्ज नहीं कराएगा, तब तक व्यवस्था की रगों में फैला यह वायरस यूं ही मासूम नागरिकों का खून चूसता रहेगा।