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Bihar Labour Day special: मुगल काल से हर सुबह लगता है मजदूर हाट, मेहनत बिकती है यहां, कीमत तय करता है वक्त

वैशाली में चूल्हा जलाने की जद्दोजहद में मुगल काल से हीं हर सुबह मजदूरों की उम्मीद की मंडी लगती है...

Labour Day Workers throng Hajipur daily labour market for jo
मुगल काल से हर सुबह लगता मजदूर हाट- फोटो : reporter

Bihar Labour Day special:  विश्व मजदूर दिवस के मौके पर वैशाली का जौहरी बाजार एक ऐसी हकीकत बयां करता है, जो सियासी नारों और जमीनी सच्चाई के बीच गहरी खाई को उजागर करती है। सुबह की पहली किरण के साथ यहां मजदूरों का हुजूम उमड़ पड़ता है एक ऐसा मंजर, जो कहीं न कहीं मुगल और अंग्रेजी दौर के गुलाम बाज़ारों की याद दिलाता है।

गंडक नदी के किनारे बसे इस इलाके में, पुराने पुल के इंट्री पॉइंट से बुद्धमूर्ति गोलंबर तक फैला यह ‘मजदूर हाट’ दशकों पुरानी परंपरा को आज भी ढो रहा है। वेशाली जिला और सारण जिला  के सैकड़ों मजदूर हर रोज सुबह 4-5 बजे यहां पहुंचते हैं। कुशल और अकुशल हर तरह के श्रमिक अपनी मेहनत की कीमत तलाशने आते हैं, इस उम्मीद में कि आज का दिन उनके घर का चूल्हा जला देगा। लेकिन हर सुबह उम्मीदों के साथ शुरू होने वाला यह मेला कई बार मायूसी पर खत्म होता है। ठेकेदार अपनी जरूरत और मोलभाव के हिसाब से मजदूर चुनते हैं, बाकी लोग पूरे दिन इंतजार के बाद खाली हाथ लौट जाते हैं। सुबह 5 से 11 बजे तक लगने वाला यह ‘लेबर चौक’ कुछ के लिए रोज़गार का जरिया बनता है, तो कईयों के लिए बेबसी का आईना।

यह मंजर उन दावों पर सवाल खड़ा करता है, जिनमें विकास और समृद्धि  की तस्वीर पेश की जाती है। यह हाट शहर के नियोक्ताओं के लिए भले सहूलियत हो, लेकिन देश के सामाजिक ढांचे पर यह एक कड़वा सच भी है जहां मेहनत बिकती है, पर उसकी कीमत तय करने का हक मजदूर के पास नहीं होता।

स्थानीय लोगों का कहना है कि करीब 90 फीसदी मजदूरों को काम मिल जाता है, लेकिन इसके पीछे की मजबूरी भी उतनी ही बड़ी है गांवों में रोजगार की कमी, निर्माण कार्यों पर असर और आर्थिक दबाव। कई बार मजदूरों को उधार लेकर घर चलाना पड़ता है, फिर भी अगले दिन वही उम्मीद लेकर हाजिरी लगानी पड़ती है।

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मजदूर दिवस के इस मौके पर यह तस्वीर हमें सोचने को मजबूर करती है क्या हमने उन हाथों को वाकई सम्मान दिया है, जो हमारे शहरों और सपनों को खड़ा करते हैं? जरूरत है कि सरकार और समाज मिलकर इन मेहनतकशों को स्थायी रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन देने की दिशा में ठोस कदम उठाएं। यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी उन श्रमिकों के लिए, जो हर दिन संघर्ष के बावजूद उम्मीद का दामन थामे रहते हैं।

रिपोर्ट- ऋषभ कुमार