Bihar News : हौसले की उड़ान, करंट की चपेट में आने आकर गया के बृजेश ने गंवाए दोनों हाथ, अब गरीब और असहाय बच्चों को दे रहे निःशुल्क शिक्षा

Bihar News : बिहार के गया जिले के केंदुआ गांव के रहने वाले बृजेश कुमार ने साबित कर दिया है कि अगर हौसले बुलंद हों, तो शारीरिक अक्षमता भी सपनों के आड़े नहीं आ सकती.....पढ़िए आगे

Bihar News : हौसले की उड़ान, करंट की चपेट में आने आकर गया के
हौसले की उड़ान - फोटो : MANOJ

GAYAJI : कौन कहता है कि 'आसमान में सुराख नहीं होता, तबीयत से एक पत्थर तो उछालो यारों' किसी ने यह बात बड़े ही संजीदगी के साथ लिखी होगी. इसका जीता जागता उदाहरण गया का बृजेश कुमार है. बृजेश कुमार के दोनों हाथ नहीं है. बृजेश के दोनों हाथ जरूर नहीं हैं, पर इसके हौसले कई सालों के संघर्ष के बीच भी जिंदा हैं. बृजेश के हौसलों की कहानी एकदम से हैरान कर देने वाली है.

दोनों हाथ नहीं, पैरों से मोबाइल चलता है बृजेश 

गया के केंदुआ गांव के रहने वाले बृजेश के दोनों हाथ नहीं है. किंतु बृजेश ने संघर्ष और हिम्मत के बूते हार नहीं मानी. बृजेश के हौसले आज एक उदाहरण के रूप में सामने है, जो हजारों दिव्यांगों के लिए भी एक प्रेरणा स्रोत के रूप में है. दोनों हाथ के बिना बृजेश वह कार्य कर रहे, जो दुष्कर माना जाता है. इस युवक के कई ऐसे कार्य हैं, जो सामने वाले को आश्चर्यचकित कर देता है. बृजेश के दोनों हाथ नहीं है, पर वह पैर से मोबाइल चलाकर हतप्रभ कर देता है. पैर से मोबाइल ही नहीं चलाता, बल्कि पैर और कटे हाथ से लिखना और पढ़ाना भी है. खास बात यह है, कि वह पैरों के अलावे मुंह के सहारे और कटे हाथ के सिरे की मदद से मोबाइल का बेहतर तरीके से संचालन कर लेता है. वह न सिर्फ मोबाइल से बात करता है, बल्कि यूट्यूब भी चलाता है, समाचार भी देखता है, मोबाइल से जो भी उपयोग में करना चाहे, वह संबंधित ऐप का उपयोग कर संचालित कर लेता है. इसके लिए उसे किसी के सहारे की जरूरत नहीं होती है.

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कटे हाथ को शिक्षा का अलग जगाने का बनाया हथियार 

बृजेश की कहानी बस इतनी सी नहीं है. बल्कि इसके हर गतिविधि में एक गजब का हौसला और जोश नजर आता है. बृजेश कटे हाथ के अंतिम सिरे को शिक्षा का अलख जगाने का हथियार भी बना लिया है. इसके बीच वह अशिक्षित समाज के सैकड़ो बच्चों को के बीच शिक्षा का अलख जगा रहा है. दरअसल बृजेश कुमार ब्लैक बोर्ड पर पढ़ाते भी है. समझने की बात यह है, कि जब दोनों हाथ नहीं है, तो फिर वह कैसे पढाता होगा, किंतु यह हकीकत है, कि दोनों हाथ नहीं होने के बावजूद भी वह ब्लैक बोर्ड पर लिखकर और बोलकर बच्चों को शिक्षित कर रहा है. वह भी ऐसे तबके को, जो कई दशकों से शिक्षा के अंधेरे में हैं. बृजेश जब कटे हाथ के अंतिम सिरे में रबर बंधवाता है और उसमें मार्कर लगाया जाता है, तो देखकर लगता है, जैसे उसको उसका हाथ सलामत हो. क्योंकि कहीं से भी उसे पढ़ाने में कोई परेशानी नहीं होती. कटे हाथ के सिरे पर रबर बांधकर मार्कर की मदद से वह ब्लैक बोर्ड पर ऐसे लिखता है, जैसे उसे कुछ हुआ ही नहीं हो. पहली कक्षा से लेकर दसवीं कक्षा तक के बच्चों को वह निशुल्क पढ़ाने का कार्य करता है.

काफी चर्चा में रहता है 

पैर से मोबाइल चला कर, पैर से लिखकर और कटे हाथों के बावजूद ब्लैक बोर्ड पर पढ़ाकर और मुंह और हाथ की मदद से भी मोबाइल चला कर बृजेश काफी चर्चा में रहता है. यह कोई सामान्य बात नहीं है, बल्कि असंभव सी बात प्रतीत होती है. किंतु बृजेश ने हौसलों से यह सब संभव कर दिखाया है और जिस जिंदगी को लोग बोझिल समझते होंगे, उस जिंदगी को संघर्ष के बूते जीतने का जज्बा बना लिया है.

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इंजीनियर बनना चाहता है बृजेश

बृजेश इंजीनियर बनना चाहता है. वह शुरू से ही मेधावी छात्र रहा है. किंतु, बीच में किस्मत जैसे रूठ गई थी. मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद अक्टूबर 2015 में एक ऐसी घटना हुई, जिससे बृजेश की जिंदगी ही दांव पर लग गई थी. दरअसल, बृजेश को अक्टूबर 2015 में 11 हजार वोल्ट का करंट लग गया. वह गंभीर रूप से झुलस गया था. उसका इलाज 5 सालों तक चला. इस बीच इलाज के दौरान उसके हाथ काटने की नौबत आई। इलाज उसके जिंदा बचने के लिए यह जरूरी था. यही वजह रही, कि बृजेश के दोनों हाथ काटने पड़े. उसको पैर और सिर में भी काफी गंभीर जख्म थे. यानी कि पूरा शरीर लहूलुहान हो गया था. किंतु इसके बावजूद बृजेश ने हिम्मत नहीं हारी. 5 सालों के लगातार इलाज के बाद उसकी जिंदगी किसी तरह से बचाई जा सके और इसके बाद भी उसने जो हौसला दिखाया है, वह काबिले तारीफ है. एक गरीब परिवार का बच्चा, जिसके पिता छोटे से किसान मजदूर हैं. उस परिवार के बेटे की जिंदगी किसी तरह से बच जाती है. किंतु फिर भी इस कमजोर परिवार का बेटा इतना हौसलामंद होगा, यह किसी ने भी नहीं सोचा था. यही वजह है, कि बृजेश आज दिव्यांग से नहीं बल्कि एक हीरो की तरह पहचाना जाता है. उसकी लोग इज्जत करते हैं. बृजेश की शुरू से ही इच्छा रही है, कि वह इंजीनियर बने. हालांकि आर्थिक तंगहाली के बीच अब वह छोटे-मोटे जॉब की तलाश में भी जुटा हुआ है. किंतु उसका सपना इंजीनियर बनने का है और इसे लेकर वाला लगातार तैयारी भी करता है. किंतु कुछ ऐसी समस्याएं आती है, जिसके कारण उसके सपने रुक जा रहे हैं.

3 सालों से शिक्षा की अलग जगा रहा

पिछले 3 सालों से बृजेश शिक्षा की अलख जगा रहा है. वह दर्जनों बच्चों को रोजाना पढ़ाता है. सबसे बड़ी बात यह है, कि वह दो गांव में बच्चों के बीच शिक्षा का अलख जगा रहा है. एक गांव उसका पैतृक गांव केंदुआ है. वहां वह बच्चों को पढाता है. वहीं, दूसरी ओर अपने ननिहाल मंझियावा गांव में भी बच्चों को पढाता है. इस तरह न  सिर्फ खुद का भविष्य संवारने की कोशिश करता है, बल्कि गरीबी के कारण बच्चों का भविष्य भी खराब न हो जाए, ऐसे तबके के बच्चों को वह पढ़ाने का कार्य करता है. यही वजह है कि अब बृजेश से पढ़ने वाले बच्चे रेगुलर पढ़ाई कर रहे हैं और मेधावी भी हो रहे हैं. यह पहली कक्षा से लेकर दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई बच्चों को पढाता है, यानी खुद की परेशानियों से जीते हुए, वह दूसरों की परेशानियों को भी दूर करने और शिक्षा का अलख जाने के बड़े मकसद में जुटा हुआ है.

क्या है बृजेश की पूरी कहानी 

वही, इस संबंध में बृजेश कुमार बताता है कि वह मजदूर परिवार का बेटा है. उसके पिता मजदूर किसान है. किसी तरह से घर परिवार का गुजारा हो पाता है. वर्ष 2015 के अक्टूबर महीने में उसे 11000 वोल्ट का करंट लगा था. करंट की चपेट में आकर बुरी तरह से झुलस गया था. इलाज के क्रम में उसके दोनों हाथ काटने पड़े थे. किसी प्रकार उसकी जान बच पाई थी.  5 सालों तक उसका इलाज चला था. मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद यह घटना घटित हुई थी. इसके बाद कई सालों तक उसकी पढ़ाई लिखाई बंद हो गई. दोनों हाथ गंवान का बावजूद भी वह हिम्मत नहीं हारा. दोनों हाथ जरूर कटे, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी. सबसे बड़ी विकट की स्थिति तब आई, जब उसकी मां भी इस बीच दुनिया से गुजर गई. पिताजी और उसके चार भाई हैं. वर्ष 2023 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहा है. उसकी पढ़ाई फिर से पूर्व की भांति शुरू हो गई है. वह रोजाना मेहनत करता है. बृजेश का कहना है कि गांव परिवार के लोगों ने सपोर्ट किया, तब जाकर उसकी जान बच सकी. हाथ कटने के बावजूद भी हौसला उसका जस का तस है. इंजीनियर बनने का सपना आज भी जिंदा है. अभी वह कोई भी छोटा मोटा जॉब करने की चाहत रखता है. किंतु किस्मत कहीं न कहीं रूठ जा रही है. वह बताता है, कि उसका सपना इंजीनियर बनने का था. आज भी वह सपना बरकरार है. वह बताता है, कि लोग कहते हैं, कि दिव्यांग को छूट मिलती है, लेकिन वह कहता है कि दिव्यांग को छूट नहीं मिलती है. क्योंकि वह जब फॉर्म भरने जाता है, तो उसका फॉर्म रिजेक्ट कर दिया जाता है. कहा जाता है, कि वह उसके दोनों हाथ नहीं है. वह कैसे काम करेगा. कौन उसके साथ रहेगा. इसी कारण उसका फॉर्म रिजेक्ट कर दिया जाता है, जिससे कोई नौकरी नहीं मिल पा रही है  वह बराबर किसी न किसी चीज का फॉर्म भरते रहता है. इंजीनियरिंग की तैयारी भी करते रहता है. बृजेश कहता है, कि वह सरकार का सम्मान करता है उसे इस बिंदु पर सहायता मिले.

हमारे जैसे इंसान इतिहास रचते हैं 

बृजेश के हौसले की बानगी यह है, कि वह आज भी जरा सा टूटा नहीं है. इतनी बड़ी घटना के बावजूद भी उसकी हौसले बुलंद हैं. वह कहता है, कि जो संस्थान हमारे द्वारा भरे गए फॉर्म को रिजेक्ट कर देता है, उन्हें पता नहीं है, कि हमारे जैसे इंसान ही इतिहास रचते हैं. बताता है, कि वह कंप्यूटर मोबाइल भी चला लेता है. वह सप्ताह में कुछ दिन अपने गांव केंदुआ में बच्चों को पड़ता है, तो कुछ दिन अपने ननिहाल में बच्चों को पढाता है. वह गरीबों के बच्चों को पढ़ा लिखा कर आगे करना चाहता है. उसके जीवन का जो लक्ष्य है, कि गरीबों के बच्चे पढें. बताता है, कि वह सिर्फ खाना नहीं खा सकता है, बाकी सारे काम वह खुद कर लेता है. पैर से मोबाइल चलाता है. पैर से लिख लेता है. बच्चों को ब्लैक बोर्ड के सहारे अपने कटे हाथ के अंतिम सिरे में रबर बांधकर उसमें मार्कर लगाकर पढाता है. उसके पैर भी हाथ की तरह काम करते हैं. वह बताता है कि उसने इसके लिए लगातार प्रैक्टिस की. वह जब अकेले होता है, और अपनी परेशानियों को समझता है, तो वह सीधा प्रेक्टिस करना शुरू करता है और यह वजह है कि आज वह मुंह के सहारे भी मोबाइल को चला लेता है. उसे विश्वास है, कि आज न तो कल उसके सपने जरूर पूरे होंगे. बस सरकार एक नजर हमारी और जरूर दें.

मनोज की रिपोर्ट