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Chapra Ram Darbar 1942 Tradition: सारण में 84 साल से चली आ रही अनूठी परंपरा, एक ही परिवार की पीढ़ियां बना रहीं मूर्तियां

फेसबुक और इंस्टाग्राम कैप्शन (Facebook/Instagram): बिहार के सारण (छपरा) से एक बेहद खूबसूरत और ऐतिहासिक परंपरा जुड़ी है! छपरा के रामराज चौक पर 1942 से लगातार राम दरबार सजाया जा रहा है। सबसे खास बात यह है कि यहां एक ही परिवार की कई पीढ़ियां मूर्तियां

Saran Ramraj Chowk 1942 tradition
सारण में 84 साल से चली आ रही अनूठी परंपरा, एक ही परिवार की पीढ़ियां बना रहीं मूर्तियां- फोटो : Reporter

बिहार के सारण (छपरा) की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत की अनूठी पहचान है शहर के रामराज चौक का राम दरबार। यहां वर्ष 1942 से दुर्गापूजा के अवसर पर भगवान श्रीराम के दरबार की झांकी सजाई जा रही है। 84 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा की खासियत है कि मूर्तियों का स्वरूप और निर्माण शैली आज भी बरकरार है। भगवान का शृंगार 1942 में तैयार कराए गए चांदी के आभूषणों से किया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, आजादी से पहले यह स्थान महमूद चौक के नाम से जाना जाता था। वर्ष 1942 में राम दरबार की स्थापना के बाद इसकी पहचान रामराज चौक के रूप में होने लगी। तब से यहां दुर्गापूजा के दौरान वैदिक विधि-विधान से पूजा- अर्चना की परंपरा कायम है।

एक ही परिवार की कई पीढ़ियां बना रहीं मूर्तियां, पुराने चांदी के आभूषणों से होता है शृंगार 

राम दरबार में भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण, हनुमान, भरत और शत्रुघ्न की करीब चार फीट ऊंची मूर्तियां स्थापित की जाती हैं। इन्हें नागर शैली में तैयार किया जाता है। सबसे खास बात यह है कि 1942 से एक ही परिवार की कई पीढ़ियां इन मूर्तियों का निर्माण करती आ रही हैं। परंपरा के मूल स्वरूप को बनाए रखना इस आयोजन की विशिष्टता है। राम दरबार में इस्तेमाल होने वाले चांदी के आभूषण भी इसकी ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा हैं। वर्ष 1942 में तैयार कराए गए इन आभूषणों से हर साल भगवान का शृंगार किया जाता है। सुसज्जित झांकी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहती है।

तीन दिनों तक श्रद्धालु करते हैं दर्शन

दुर्गापूजा के अवसर पर सृष्टि के दिन विधि- विधान से पर्दा हटाकर राम दरबार को भक्तों के दर्शन के लिए खोला जाता है। इसके बाद लगातार तीन दिनों तक श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। मां दुर्गा के पंडालों के साथ राम दरबार का दर्शन भी शहर की पूजा परंपरा का प्रमुख आकर्षण है। समिति के सदस्य एवं युवा समाजसेवी मनीष मिश्रा ने बताया कि स्थानीय बुजुर्गों और बुद्धिजीवियों ने 1942 में इस परंपरा की शुरुआत की थी। लोगों के निरंतर सहयोग से आज भी यह आयोजन अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान बनाए हुए है।

NSIT
Nsmch

 छपरा धर्मेंद्र रस्तोगी की रिपोर्ट