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मढ़ौरा चीनी मिल की बरसों पुरानी खामोशी टूटेगी? तमिलनाडु से आए 'खास' मेहमान, किसानों के चेहरों पर लौट आई रौनक!

बिहार के मढ़ौरा में 1904 में स्थापित ऐतिहासिक चीनी मिल को फिर से चालू करने की तैयारी है। तमिलनाडु के SNJ ग्रुप ने दौरा किया है। जिसके बाद स्थानीय ग्रामीणों में मिल के दिन बहुरने की उम्मीद जागी है।

मढ़ौरा चीनी मिल की बरसों पुरानी खामोशी टूटेगी? तमिलनाडु से आ

Chhapra - दशकों से सन्नाटे और खंडहरों में तब्दील हो चुकी ऐतिहासिक मढ़ौरा चीनी मिल के दिन अब फिर से बहुरने वाले हैं। बिहार सरकार की 'सात निश्चय-3' योजना के तहत राज्य में बंद पड़ी मिलों को पुनर्जीवित करने की कवायद तेज हो गई है। इसी क्रम में रविवार को तमिलनाडु के प्रतिष्ठित औद्योगिक घराने 'एसएनजे ग्रुप ऑफ कंपनीज' (SNJ Group) के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने मिल का दौरा कर भविष्य की संभावनाओं को तलाशा।

निवेशकों का दौरा और आधारभूत संरचना का जायजा

रविवार, 15 मार्च को मढ़ौरा पहुँचे निवेशकों के दल ने मिल परिसर का बारीकी से निरीक्षण किया। प्रतिनिधिमंडल ने दशकों पुरानी मशीनरी, उपलब्ध जमीन और खंडहर हो चुके भवनों की वर्तमान स्थिति का आकलन किया। निवेशकों का मानना है कि यदि आधुनिक तकनीक और बेहतर आधारभूत ढांचे का विकास किया जाए, तो इस ऐतिहासिक मिल को फिर से चीनी उत्पादन का केंद्र बनाया जा सकता है। यह दौरा महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि बिहार में औद्योगिक निवेश की दिशा में एक ठोस कदम माना जा रहा है।

गन्ना किसानों से सीधा संवाद और फीडबैक

निरीक्षण के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने केवल मिल की दीवारों को ही नहीं देखा, बल्कि क्षेत्र के असली हितधारकों यानी गन्ना किसानों से भी मुलाकात की। निवेशकों ने किसानों से गन्ना उत्पादन की लागत, उपज की गुणवत्ता और बाजार की उपलब्धता पर चर्चा की। प्रतिनिधिमंडल ने खेतों में जाकर फसल की स्थिति देखी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मिल शुरू होने पर कच्चे माल की निर्बाध आपूर्ति संभव होगी या नहीं। किसानों ने भी अपनी समस्याओं और उम्मीदों को निवेशकों के सामने बेबाकी से रखा।

सात निश्चय-3: बिहार की नई चीनी नीति

मढ़ौरा चीनी मिल का पुनरुद्धार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की 'सात निश्चय-3' योजना का हिस्सा है। इस योजना के तहत राज्य सरकार न केवल बंद पड़ी मिलों को चालू करने का प्रयास कर रही है, बल्कि प्रदेश में 25 नई चीनी मिलें स्थापित करने का लक्ष्य भी रखा गया है। इससे पहले गोपालगंज की सासामुसा चीनी मिल का भी निरीक्षण किया जा चुका है, जो यह दर्शाता है कि सरकार चीनी उद्योग के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए गंभीर है।

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1904 का गौरवशाली इतिहास और वर्तमान स्थिति

मढ़ौरा चीनी मिल का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। इसकी स्थापना ब्रिटिश शासन के दौरान साल 1904 में हुई थी, जो इसे बिहार की सबसे पुरानी मिलों में से एक बनाती है। एक समय था जब यह मिल पूरे सारण क्षेत्र की आर्थिक रीढ़ हुआ करती थी। दशकों के सन्नाटे के बाद अब निजी निवेशकों की दिलचस्पी ने स्थानीय लोगों में रोजगार और विकास की नई उम्मीदें जगा दी हैं।

औद्योगिक क्रांति और रोजगार की राह

अगर एसएनजे ग्रुप के साथ यह समझौता जमीन पर उतरता है, तो मढ़ौरा न केवल औद्योगिक मानचित्र पर वापस लौटेगा, बल्कि हजारों स्थानीय युवाओं को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी मिलेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, मिल शुरू होने से सहायक उद्योगों (जैसे एथेनॉल और बिजली उत्पादन) का मार्ग भी प्रशस्त होगा। बिहार सरकार और निवेशकों की यह जुगलबंदी राज्य को फिर से 'चीनी का कटोरा' बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है।