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सुल्तानगंज से बाबा धाम यात्रा: परशुराम से शुरू हुई आस्था की परंपरा, आज करोड़ों कांवड़ियों का बना महापर्व

सावन का महीना आते ही सुल्तानगंज से देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम तक करीब 105 किलोमीटर लंबा कांवड़ पथ पूरी तरह भगवामय हो उठता है।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम को दुनिया का पहला कांवड़िया माना जाता है....

सुल्तानगंज से बाबा धाम यात्रा: परशुराम से शुरू हुई आस्था की
सुल्तानगंज से बाबा धाम यात्रा- फोटो : चन्द्रशेखर भगत

Banka : सावन का महीना आते ही सुल्तानगंज से देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम तक करीब 105 किलोमीटर लंबा कांवड़ पथ पूरी तरह भगवामय हो उठता है। हर ओर 'बोल बम' और 'हर-हर महादेव' के जयघोष गूंजते हैं। उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करने के लिए करोड़ों शिवभक्त कठिन पदयात्रा करते हैं। यह यात्रा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, तपस्या, त्याग, सेवा और अटूट विश्वास का एक जीवंत प्रतीक बन चुकी है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम को दुनिया का पहला कांवड़िया माना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने ही सबसे पहले सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर पैदल देवघर पहुंचकर भगवान बैद्यनाथ का जलाभिषेक किया था। इस यात्रा की शुरुआत का कोई निश्चित या प्रमाणित ऐतिहासिक वर्ष उपलब्ध नहीं है, लेकिन धार्मिक ग्रंथों के अनुसार यह परंपरा वैदिक एवं पौराणिक काल से चली आ रही है।

इस यात्रा में भक्तों की भक्ति के कई अनोखे रूप देखने को मिलते हैं, जहाँ कोई सामान्य कांवड़ लेकर तो कोई डाक कांवड़ के रूप में दौड़ते हुए बाबा धाम पहुंचता है। बांका जिले में पड़ने वाले लगभग 55 किलोमीटर लंबे कांवड़ पथ पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए जिला प्रशासन द्वारा पांच टेंट सिटी बनाई गई हैं। इनमें 'दीदी की रसोई' और सुधा मिल्क पार्लर के माध्यम से सस्ते व स्वच्छ भोजन की व्यवस्था की गई है, साथ ही विभिन्न संस्थाओं द्वारा निःशुल्क सेवा शिविर भी लगाए गए हैं।

कांवड़ पथ पर इस बार पश्चिम बंगाल के राजकुमार महतो की कठिन साधना लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। वे दोनों हाथों के बल 'बिच्छू' मुद्रा में सुल्तानगंज से बाबा बैद्यनाथ धाम की यात्रा कर रहे हैं। पिछले दो वर्षों से देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों की यात्रा कर रहे राजकुमार महतो ने बताया कि उन्हें यह शक्ति भगवान भोलेनाथ की कृपा से मिलती है और वे एक बार में करीब 60 से 70 फीट तक हाथों के बल चल लेते हैं।

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सुल्तानगंज से बाबा धाम तक की यह कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की सनातन परंपरा, सामाजिक समरसता और अटूट श्रद्धा का विराट उत्सव है। यहाँ जाति, भाषा और वर्ग की सभी सीमाएं मिट जाती हैं, और हर कांवड़िया केवल शिवभक्त बन जाता है। जिला प्रशासन और स्थानीय लोगों के सहयोग से यह यात्रा हर साल करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का सबसे बड़ा केंद्र साबित होती है।

चंद्रशेखर  भगत की रिपोर्ट