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85वें शहादत दिवस पर याद आए अगस्त क्रांति के सात बिहारी शहीद, खंडहर में दफन हो रही शहीद जगतपति की विरासत

Bihar 85th Martyrdom Day:भारत माता को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने का जुनून लिए नौजवानों का एक जत्था हाथों में तिरंगा लेकर सचिवालय की ओर बढ़ रहा था। मकसद साफ था—अंग्रेजी हुकूमत के बीच हिंदुस्तान की आन-बान-शान तिरंगा फहराना। लेकिन...

Bihar Remembers Seven August Kranti Martyrs on 85th Martyrdo
शहीद की विरासत पर सरकारी उदासीनता का साया- फोटो : reporter

Aurangabad:  तारीख थी 11 अगस्त 1942। जगह थी पटना सचिवालय। दोपहर के 11 बजकर 2 मिनट। भारत माता को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने का जुनून लिए नौजवानों का एक जत्था हाथों में तिरंगा लेकर सचिवालय की ओर बढ़ रहा था। मकसद साफ था—अंग्रेजी हुकूमत के बीच हिंदुस्तान की आन-बान-शान तिरंगा फहराना। लेकिन तभी ब्रिटिश हुकूमत की बंदूकों ने गोलियां उगलनी शुरू कर दीं। देखते ही देखते सात नौजवान गोलियों से छलनी होकर देश की आजादी की बलिवेदी पर शहीद हो गए।लेकिन अंग्रेजी गोलियां उनके हौसले को नहीं तोड़ सकीं। सीने पर गोलियां खाते हुए भी इन वीरों ने तिरंगा फहरा दिया। उनकी शहादत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर हो गई। पटना के पुराने सचिवालय के पास स्थित सात शहीद स्मारक आज भी उस बलिदान की गवाही देता है।इन सात अमर शहीदों में एक नाम शहीद जगतपति कुमार का है, जिनकी जन्मभूमि औरंगाबाद जिले के ओबरा प्रखंड में पुनपुन नदी के किनारे बसे खरांटी गांव में है।

जगतपति कुमार का जन्म सर्टिफिकेट के अनुसार 7 मार्च 1923 को हुआ था। उनके पिता जमींदार सुखराज बहादुर थे। परिवार में केदार सिंहा और सरयू प्रसाद के बाद जगतपति तीसरे पुत्र थे। प्रारंभिक शिक्षा गांव की पाठशाला में हुई। महज नौ वर्ष की उम्र के बाद उच्च शिक्षा के लिए वे पटना चले गए और कॉलेजिएट स्कूल से 1938 में मैट्रिक की परीक्षा पास की। इसके बाद उन्होंने बीएन कॉलेज में दाखिला लिया।इसी दौरान देश में भारत छोड़ो आंदोलन की आग भड़क उठी। 9 अगस्त को डॉ. राजेंद्र प्रसाद की गिरफ्तारी के बाद बिहार में आंदोलन और तेज हो गया। छात्र अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। जगह-जगह रेल और तार व्यवस्था को निशाना बनाया जाने लगा।11 अगस्त को पटना के भंवरपोखर में सभा को संबोधित करने के दौरान अनुग्रह बाबू की गिरफ्तारी ने छात्रों के आक्रोश को और भड़का दिया। इसके बाद छात्रों ने सचिवालय पर तिरंगा फहराने का फैसला किया। इसी जत्थे में बीएन कॉलेज के छात्रों का नेतृत्व जगतपति कुमार कर रहे थे।

छात्र जैसे ही सचिवालय के पूर्वी गेट की ओर बढ़े, तत्कालीन अंग्रेज जिलाधिकारी डब्ल्यू. जी. आर्चर के आदेश पर पुलिस ने गोली चला दी। गोलियों की बौछार के बीच सात नौजवान एक-एक कर शहीद हो गए।कहा जाता है कि गोलीबारी के दौरान जगतपति कुमार ने अंग्रेजों को ललकारते हुए कहा था-“पैर में गोली क्या मारते हो, सीने पर मारो।”और फिर गोलियां उनके सीने को छलनी कर गईं। लेकिन उनके साथियों ने तिरंगे को सचिवालय पर फहरा दिया। यह सिर्फ एक झंडा फहराना नहीं था, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत के सामने भारतीय युवाओं की खुली हुंकार थी।

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हर साल 11 अगस्त को इन सात अमर शहीदों—रामानंद सिंह, जगतपति कुमार, रमाकांत सिन्हा, सतीश प्रसाद झा, देवी नंद चौधरी, राजेंद्र सिंह और रामगोविंद सिंह—को श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है।पटना में सात शहीद स्मारक पर सरकारी समारोह आयोजित होता है। वहीं शहीदों के पैतृक गांवों में भी उनकी शहादत को नमन किया जाता है। 11 अगस्त 2026 को जगतपति कुमार समेत सभी सात शहीदों का 85वां शहादत दिवस श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है।खरांटी गांव में पुनपुन नदी के किनारे स्थित स्मारक पर भी हर वर्ष शहादत समारोह आयोजित कर जगतपति कुमार को श्रद्धांजलि दी जाती है।

विडंबना देखिए जिस घर में शहीद जगतपति कुमार का जन्म हुआ, जहां उनकी किलकारियां गूंजीं, जहां उनका बचपन बीता और जहां उन्होंने जीवन के शुरुआती सपने देखे, आज वही पैतृक आवास खंडहर में तब्दील हो चुका है।कभी बुलंद इमारत रहा यह मकान अब वीरान पड़ा है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह जगह आज सांप-बिच्छुओं का बसेरा बन चुकी है। जिस घर की दीवारों ने देश के लिए जान न्योछावर करने वाले एक अमर सपूत का बचपन देखा, वही दीवारें अब संरक्षण के इंतजार में ढह रही हैं।आमतौर पर स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों से जुड़ी धरोहरों को सरकारें संरक्षित करती हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके संघर्ष और बलिदान से परिचित हो सकें। लेकिन जगतपति कुमार के मामले में ऐसी पहल नजर नहीं आती।उनका पैतृक आवास आज भी राष्ट्रीय स्मारक बनने की बाट जोह रहा है। न कोई भव्य संग्रहालय, न संरक्षित धरोहर और न ही ऐसा स्मृति स्थल, जहां नई पीढ़ी पहुंचकर इस अमर बलिदान की कहानी जान सके।

सरकारी उपेक्षा का आलम यह है कि शहीद के पैतृक गांव खरांटी में उनकी आदमकद प्रतिमा तक नहीं है। स्मारक परिसर में उनकी छोटी प्रतिमा जरूर स्थापित है। औरंगाबाद जिला मुख्यालय में भी उनकी कोई भव्य स्मृति-स्थली नहीं है।नगर भवन और रमेश चौक के पास उनकी छोटी प्रतिमाएं स्थापित हैं। विडंबना यह कि नगर भवन के पास स्थापित प्रतिमा मानो उसकी पहरेदारी करती नजर आती है, जबकि रमेश चौक की प्रतिमा के आसपास का परिवेश भी शहीद के गौरवशाली इतिहास के अनुरूप स्मारक का स्वरूप नहीं दे पाता।

जगतपति कुमार की कहानी सिर्फ एक शहीद की कहानी नहीं है। यह उस पीढ़ी की कहानी है जिसने आजादी की कीमत अपनी जान देकर चुकाई थी। ऐसे में उनकी स्मृतियों का खंडहर में तब्दील होना सिर्फ एक मकान का ढहना नहीं, बल्कि इतिहास के एक जीवंत अध्याय का मिटना है।जरूरत है कि सरकार शहीद जगतपति कुमार के पैतृक आवास को राष्ट्रीय स्मारक के रूप में संरक्षित करे, खरांटी में उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित हो और औरंगाबाद में उनके नाम से ऐसा स्मृति परिसर विकसित किया जाए, जहां स्वतंत्रता आंदोलन और उनकी शहादत की पूरी गाथा सुरक्षित रखी जा सके।क्योंकि जिस देश की आजादी के लिए सात नौजवानों ने अंग्रेजी गोलियां अपने सीने पर झेल लीं, उनकी स्मृतियों को सरकारी फाइलों और खंडहरों के हवाले छोड़ देना उस बलिदान के साथ न्याय नहीं होगा।

दीनानाथ मौआर की रिपोर्ट