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भोजपुर लैंड स्कैम: फर्जी एफिडेविट पर हुआ करोड़ों का म्यूटेशन, पूर्व CO समेत पूरी अंचल टीम पर FIR

भोजपुर जिले से भ्रष्टाचार और जालसाजी का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां भू-माफियाओं ने अंचल कार्यालय के अधिकारियों के साथ मिलकर जाली हस्ताक्षर और फर्जी एफिडेविट (शपशपत्र) के सहारे करोड़ों की पैतृक जमीन का म्यूटेशन अपने नाम करा लिया।

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भोजपुर लैंड स्कैम: फर्जी एफिडेविट पर हुआ करोड़ों का म्यूटेशन, पूर्व CO समेत पूरी अंचल टीम पर FIR- फोटो : Reporter

बिहार के भोजपुर जिले में जमीन दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) को लेकर एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है, जिसने प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा दिया है। यहां एक फर्जी एफिडेविट (शपथपत्र) के सहारे करोड़ों रुपये की कीमती जमीन का म्यूटेशन कराने का गंभीर आरोप लगा है। इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उदवंतनगर के तत्कालीन अंचलाधिकारी (CO) वकील प्रसाद सिंह, तत्कालीन अंचल निरीक्षक अनिल कुमार सिंह, राजस्व कर्मचारी तारकेश्वर राम और कुछ कथित भू-माफियाओं के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की गंभीर धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

पैतृक संपत्ति के विवाद के बीच बेची गई जमीन

पूरा मामला एक पारिवारिक और अदालती विवाद से जुड़ा हुआ है। शिकायतकर्ता नागेंद्र पांडेय के मुताबिक, उनकी पैतृक संपत्ति को लेकर व्यवहार न्यायालय, आरा में साल 2011 से ही विभाजन वाद (Partition Suit No. 255/11) लंबित है। आरोप है कि इसी कानूनी विवाद के बीच, साल 2017 में उनके दिवंगत भाई की पत्नी ने कथित तौर पर अपने हिस्से से ज्यादा जमीन कुछ बाहरी लोगों के नाम बेच दी। इस जमीन को खरीदने वालों में जटाशंकर पांडेय, हृदयानंद मिश्रा, सत्येंद्र सिंह, जितेंद्र कुमार सिंह और उमेश सिंह जैसे लोग शामिल थे, जिन्होंने बाद में इस पर म्यूटेशन का खेल रचा।

आपत्ति को दरकिनार कर जाली एफिडेविट का सहारा

पीड़ित नागेंद्र पांडेय का दावा है कि जमीन की रजिस्ट्री होने के बाद उन्होंने समय रहते अंचल कार्यालय में लिखित आपत्ति दर्ज कराई थी और म्यूटेशन प्रक्रिया रोकने की मांग की थी। अंचल अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन भी दिया था कि विवादित जमीन का दाखिल-खारिज नहीं होगा। लेकिन आरोप है कि भू-माफियाओं ने राजस्व अधिकारियों के साथ मिलकर एक गहरी साजिश रची। 10 फरवरी 2018 को आरा कोर्ट के नोटरी से नागेंद्र पांडेय के नाम पर एक फर्जी शपथपत्र तैयार कराया गया, जिसपर उनके जाली हस्ताक्षर कर यह दिखा दिया गया कि उन्हें इस म्यूटेशन पर कोई आपत्ति नहीं है।

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नियमों की धज्जी उड़ाकर बिना नोटिस पूरी की प्रक्रिया

इस पूरे फर्जीवाड़े का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि दाखिल-खारिज की इस पूरी प्रक्रिया के दौरान शिकायतकर्ता को न तो कोई आधिकारिक नोटिस दिया गया और न ही अपनी बात रखने के लिए सुनवाई का कोई मौका मिला। नियमतः किसी भी म्यूटेशन पर आपत्ति आने के बाद दोनों पक्षों का सत्यापन और सुनवाई अनिवार्य होती है, लेकिन यहां नियमों को ताक पर रखकर कथित फर्जी एफिडेविट के आधार पर म्यूटेशन को हरी झंडी दे दी गई। कानूनी जानकारों के मुताबिक, यह चूक साधारण प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक सुनियोजित आपराधिक साजिश की ओर इशारा करती है।

पूर्व CO का विवादों से पुराना नाता, अधिकारियों की भूमिका पर सवाल

इस मामले में नामजद तत्कालीन सीओ वकील प्रसाद सिंह का विवादों से पुराना नाता रहा है। वे पूर्व में भी आय से अधिक संपत्ति के मामले में आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की रडार पर आ चुके हैं और काफी सुर्खियों में रहे हैं। अब इस नए मामले में भी तत्कालीन सीओ, अंचल निरीक्षक और राजस्व कर्मचारी की भूमिका पूरी तरह से जांच के घेरे में है। स्थानीय लोगों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि बिना विभागीय मिलीभगत के इतनी बड़ी जालसाजी को अंजाम देना मुमकिन नहीं था।

फोरेंसिक जांच की मांग और आगे की पुलिसिया कार्रवाई

लगातार की गई शिकायतों और भोजपुर पुलिस अधीक्षक (SP) को दिए गए आवेदन के बाद आखिरकार इस मामले में पुलिस ने औपचारिक केस दर्ज कर लिया है। अब पीड़ित पक्ष ने कोर्ट में जमा किए गए कथित शपथपत्र और उस पर किए गए हस्ताक्षरों की फोरेंसिक जांच कराने की मांग तेज कर दी है। पीड़ित का कहना है कि वैज्ञानिक जांच से दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। फिलहाल, पुलिस की प्राथमिकी के बाद पूरे जिले की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच की आंच किन-किन बड़े चेहरों तक पहुंचती है।