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'भारत छोड़ो' आंदोलन से आपातकाल तक:देश के दिग्गजों नेताओं की नर्सरी, DUSU चुनाव आज भी क्यों है इतना खास?जानिए

1947 में स्थापित और पंडित नेहरू द्वारा उद्घाटित DUSU ने भारतीय राजनीति को अरुण जेटली, रेखा गुप्ता और अजय माकन जैसे कद्दावर नेता दिए हैं। जानिए आपातकाल और मंडल आंदोलन से लेकर आज तक कैसे DUSU राष्ट्रीय राजनीति के लिए लॉन्चपैड बना हुआ है।

Delhi University Student Union History

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) का इतिहास भारत की आजादी जितना ही पुराना है। वर्ष 1947 में दिल्ली विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के तत्कालीन प्रमुख डॉ. वीकेआरवी राव के नेतृत्व में एक विशेष समिति बनाई गई थी, जिसने कॉलेज संघ के अध्यक्षों के साथ मिलकर इसके संविधान का मसौदा तैयार किया। इसके बाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 9 अप्रैल 1949 को इसका औपचारिक उद्घाटन किया, जिससे इसके शुरुआती दिनों से ही राष्ट्रीय नेतृत्व का जुड़ाव स्थापित हो गया।

स्वतंत्रता आंदोलन और सक्रियता की ऐतिहासिक विरासत

डीयूएसयू केवल एक छात्र संगठन नहीं रहा, बल्कि इसे राष्ट्र निर्माण और जन आंदोलनों की समृद्ध विरासत मिली है। वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हिंदू कॉलेज, सेंट स्टीफंस कॉलेज और इंद्रप्रस्थ कॉलेज के छात्रों ने औपनिवेशिक हुकूमत के खिलाफ जोरदार आवाज उठाई थी और जेल में बंद स्वतंत्रता सेनानियों की रिहाई के लिए आंदोलन किया था। छात्र राजनीति की यही आक्रामक और जागरूक शैली आगे चलकर डीयू की पहचान बनी।

1973 का ऐतिहासिक मोड़: प्रत्यक्ष मतदान प्रणाली की शुरुआत

वर्ष 1973 में डीयूएसयू के चुनावी इतिहास में सबसे बड़ा बदलाव आया, जब विश्वविद्यालय प्रशासन ने अप्रत्यक्ष चुनाव प्रक्रिया को खत्म कर प्रत्यक्ष मतदान प्रणाली को अपनाया। इससे पहले केवल कुछ सौ कॉलेज पार्षद मिलकर अपने नेताओं का चुनाव करते थे। लेकिन प्रत्यक्ष प्रणाली लागू होने से हर आम छात्र को वोट देने का अधिकार मिला, जिससे मुख्यधारा के राष्ट्रीय राजनीतिक दलों और उनके छात्र संगठनों का ध्यान इस चुनाव की तरफ तेजी से आकर्षित हुआ।

आपातकाल के खिलाफ आंदोलन और अरुण जेटली का उदय

1973 के चुनावी बदलाव के दो साल बाद ही डीयूएसयू ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी ताकत का अहसास कराया। वर्ष 1975 में देश में आपातकाल लागू होने के दौरान डीयूएसयू अध्यक्ष अरुण जेटली के नेतृत्व में छात्रों ने सरकार के फैसले का पुरजोर विरोध किया। इस विरोध प्रदर्शन के कारण अरुण जेटली को मीसा (MISA) कानून के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। इस घटना ने साबित कर दिया कि डीयूएसयू केवल कैंपस तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय संकट में नेताओं को तराशने की कसौटी भी है।

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मंडल आयोग, आरक्षण आंदोलन और राजीव गोस्वामी

वर्ष 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद पूरे देश में उठे विवाद का मुख्य केंद्र नॉर्थ कैंपस बन गया। देश का सबसे बड़ा सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न दिल्ली विश्वविद्यालय की सड़कों पर बहस का विषय था। इसी दौर में आरक्षण विरोधी आंदोलन का प्रमुख चेहरा बने राजीव गोस्वामी अगले ही साल डीयूएसयू अध्यक्ष चुने गए। इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट हो गया कि देश की राष्ट्रीय बहसें और सामाजिक मुद्दे सीधे तौर पर कैंपस की राजनीति को प्रभावित करते हैं।

भारतीय जनता पार्टी के दिग्गजों की लॉन्चपैड बनी डीयूएसयू

डीयूएसयू ने भारतीय जनता पार्टी को कई शीर्ष नेता दिए हैं। 1974-75 में एबीवीपी से डीयूएसयू अध्यक्ष रहे अरुण जेटली आगे चलकर भारत के वित्त मंत्री और राज्यसभा में सदन के नेता बने। इसी तरह 1996-97 में अध्यक्ष रहीं रेखा गुप्ता दिल्ली भाजपा की महासचिव, महिला मोर्चा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और वर्तमान में दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं। इसके अलावा विजेंद्र गुप्ता (उपाध्यक्ष 1984-85) दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष बने और विजय गोयल (अध्यक्ष 1977-78) केंद्र सरकार में मंत्री बने।

कांग्रेस और विपक्षी दलों को भी मिले कद्दावर नेता

डीयूएसयू का प्रभाव किसी एक दल तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसने कांग्रेस को भी कई प्रमुख चेहरे दिए। एनएसयूआई की ओर से 1985-86 में डीयूएसयू अध्यक्ष बने अजय माकन आगे चलकर केंद्र सरकार में मंत्री बने और दिल्ली राजनीति में बड़ा नाम अर्जित किया। इसी प्रकार 1995-96 में अध्यक्ष रहीं अलका लांबा ने अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की कमान संभाली। इन सफलताओं ने डीयूएसयू चुनावों को राजनीतिक दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बना दिया।

बढ़ते राजनीतिक प्रभाव के साथ धन और बाहुबल की चुनौतियां

जैसे-जैसे डीयूएसयू चुनाव का दायरा और राष्ट्रीय मीडिया की नजरें बढ़ीं, वैसे-वैसे इस मुकाबले में धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल भी चिंता का विषय बनने लगा। चुनावों में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से 2006 में लिंगदोह समिति की सिफारिशों को लागू किया गया। इसके तहत उम्मीदवारों के खर्च की सीमा, आयु सीमा और चुनाव प्रचार के तरीकों पर कड़े नियम और प्रतिबंध लागू किए गए।

नियमों के उल्लंघन पर दिल्ली उच्च न्यायालय का सख्त रुख

हाल के समय में चुनाव प्रचार के दौरान दिशा-निर्देशों के उल्लंघन को लेकर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने नियमों के उल्लंघन पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए डीयूएसयू चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद किसी भी प्रकार के विजय जुलूस (विक्ट्री रैली) पर रोक लगा दी। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि यह प्रतिबंध सड़कों के साथ-साथ विश्वविद्यालय परिसर और छात्रावासों के भीतर भी पूरी तरह लागू रहेगा।

ताजा चुनावी नतीजे: तीन मुख्य पदों पर ABVP का परचम

हाल ही में घोषित हुए डीयूएसयू चुनाव परिणामों में एक बार फिर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) का वर्चस्व देखने को मिला। एबीवीपी ने चार में से तीन प्रमुख पदों पर शानदार जीत दर्ज की। यश डबास ने अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की, जबकि रिया छावड़ी ने सचिव और लक्ष्य राज सिंह ने संयुक्त सचिव पद पर अपना कब्जा जमाया।

उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय प्रत्याशी की अप्रत्याशित जीत

इस चुनाव में मुख्य मुकाबला हमेशा की तरह एबीवीपी और कांग्रेस की छात्र शाखा एनएसयूआई (NSUI) के बीच ही रहा। हालांकि, उपाध्यक्ष पद पर एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला, जहाँ एनएसयूआई के पूर्व सदस्य और स्वतंत्र उम्मीदवार दीपांशु शोकीन ने जीत दर्ज कर सबको चौंका दिया। यह चुनाव परिणाम एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का प्रतिबिंब बनकर सामने आया।

सात दशकों से जारी राष्ट्रीय नेतृत्व तराशने का सफर

स्थापना के सात दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी डीयूएसयू का महत्व और प्रासंगिकता बनी हुई है। सामान्य प्रतीत होने वाली यह छात्र राजनीति राष्ट्रीय स्तर पर देश के भावी नेताओं के करियर का रुख तय करती रही है। यही कारण है कि आज भी डीयूएसयू वह ऐतिहासिक मंच बना हुआ है, जहाँ से भारतीय राजनीति के बड़े और नए अध्यायों की शुरुआत होती है।