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न्याय की भारी कीमत: ₹150 के उधार के लिए 45 साल तक लड़ा मुकदमा!700 तारीखें पड़ीं और ₹6 लाख से ज्यादा खर्च

न्याय व्यवस्था का एक बेहद हैरान करने वाला मामला सामने आया है। गायघाट थाना क्षेत्र में साल 1981 में महज ₹150 के विवाद को लेकर मारपीट और आगजनी हुई थी। यह केस 1981 से लेकर 2026 तक यानी पूरे 45 साल तक अदालत में चला। करीब 700 तारीखें पड़ीं

150 rupees loan court case verdict-after-45-years

महज ₹150 के मामूली उधार से शुरू हुआ एक विवाद करीब 45 साल तक देश की लंबी अदालती प्रक्रिया के चक्रव्यूह में फंसा रहा। आखिरकार, मुजफ्फरपुर के जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश-20 की अदालत ने इस बेहद पुराने मामले में अपना अंतिम फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने इस केस के एकमात्र जीवित बचे 75 वर्षीय बुजुर्ग आरोपी भिखारी सहनी को मारपीट और बंधक बनाने का दोषी करार दिया। हालांकि, फैसला आने तक वक्त का एक बड़ा पहिया घूम चुका था।

साल 1981 की वो रात: जब उधार मांगने पर भड़का था विवाद

इस पूरे कानूनी संग्राम की नींव आज से करीब साढ़े चार दशक पहले 5 मई 1981 की रात को पड़ी थी। मुजफ्फरपुर के गायघाट थाना क्षेत्र के एक गांव की रहने वाली कबूतरी मलाहिन ने इस मामले की प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई थी। शिकायत के मुताबिक, उसी दिन उनके बेटे लोढ़न सहनी ने गांव के ही भिखारी सहनी से अपने उधार के ₹150 वापस मांगे थे। इसी बात से नाराज होकर आरोपी रात के करीब 11 बजे लाठी-डंडों से लैस होकर पीड़ित के घर आ धमके।

हिंसा और आगजनी: हाथ-पैर बांधे और फूंक दिया आशियाना

दर्ज कराई गई एफआईआर के अनुसार, जब उधार वापस मांगने का विरोध किया गया, तो आरोपियों ने कबूतरी मलाहिन के साथ बेरहमी से मारपीट की। बीच-बचाव करने आए उनके बेटे लोढ़न सहनी को आरोपियों ने रस्सी से बांधकर बंधक बना लिया। इतना ही नहीं, इसके बाद आरोपियों ने घर में आग लगा दी, जिससे चौखट, किवाड़, दो मन धान, एक मन गेहूं, खैनी और कपड़े जल गए। उस दौर (1981) के हिसाब से लगभग ₹2,500 मूल्य की संपत्ति जलकर खाक हो गई थी।

1981 से 2026 का सफर: तारीख-दर-तारीख खिंचता चला गया केस

इस घटना के बाद पुलिस ने तेजी दिखाते हुए 14 जून 1981 को ही चार्जशीट दाखिल कर दी थी और 17 जनवरी 1983 को कोर्ट ने आरोप भी तय कर दिए थे। लेकिन इसके बाद यह मामला फाइलों में दबता चला गया। साल 2024 में इस केस को त्वरित सुनवाई (Speedy Trial) के लिए विशेष अदालत में ट्रांसफर किया गया। इस लंबी सुनवाई के दौरान सात गवाहों के बयान दर्ज हुए, जिनमें से दो स्वतंत्र गवाह समय के साथ अपने बयान से मुकर गए और उन्हें कोर्ट ने होस्टाइल (पक्षद्रोही) घोषित कर दिया।

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एक आरोपी की मौत: फैसले का इंतजार करते-करते दम तोड़ गया साथी

यह कानूनी लड़ाई इतनी लंबी खिंची कि इस कांड के एक अन्य आरोपी कप्पल सहनी को तो यह भी पता नहीं चल सका कि अदालत उन्हें दोषी मानती है या बेगुनाह। मुकदमे की लंबी अवधि के दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई। बाद में ग्राम कचहरी के सरपंच द्वारा जारी मृत्यु प्रमाण पत्र को अदालत में पेश किया गया, जिसके आधार पर कप्पल सहनी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही को बहुत पहले ही समाप्त कर दिया गया था।

कोर्ट ने क्यों दी राहत? बुजुर्ग आरोपी को जेल भेजने के बजाय दी फटकार

सजा की बहस के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि मुख्य आरोपी भिखारी सहनी अब 75 वर्ष के बुजुर्ग हो चुके हैं, उनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है और वे पिछले 45 साल से मानसिक व शारीरिक रूप से इस मुकदमे को झेल रहे हैं। उनका कोई पुराना क्रिमिनल रिकॉर्ड भी नहीं है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने मानवीय आधार पर 'अपराधिक परिवीक्षा अधिनियम' का लाभ दिया। कोर्ट ने उन्हें जेल भेजने के बजाय भविष्य में किसी भी गलत काम में शामिल न होने की सख्त चेतावनी और भर्त्सना (कड़ी फटकार) देकर रिहा कर दिया।

न्याय की भारी कीमत: ₹150 के चक्कर में फूंक डाले ₹6 लाख

यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था में देरी और उस पर होने वाले खर्च का एक अनोखा और आंखें खोलने वाला उदाहरण बन गया है। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, केवल साल 2018 से 2026 के बीच ही इस केस में करीब 130 तारीखें पड़ीं। पूरे 45 साल के सफर में अनुमानतः 700 से अधिक पेशियां हुईं। जिस ₹150 के लिए यह विवाद शुरू हुआ था, उसे साबित करने और खुद को बचाने के चक्कर में दोनों पक्षों के कुल मिलाकर ₹5 से ₹6 लाख खर्च हो गए।