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बेटियों ने निभाया बेटे से बढ़कर फर्ज, पिता की अर्थी को दिया कंधा, रूढ़ियों की दीवार तोड़ छोटी बेटी ने दी मुखाग्नि

Bihar News: कहते हैं कि रिश्ते खून से नहीं, बल्कि मोहब्बत, जिम्मेदारी और एहसास से निभाए जाते हैं।...

Daughters Break Barriers Carry Father Bier Perform Last Rite
बेटियों ने निभाया बेटे से बढ़कर फर्ज- फोटो : reporter

Bihar News: कहते हैं कि रिश्ते खून से नहीं, बल्कि मोहब्बत, जिम्मेदारी और एहसास से निभाए जाते हैं। मुजफ्फरपुर जिले के सिवाईपट्टी थाना क्षेत्र के घोसौत गांव में एक ऐसी भावुक तस्वीर सामने आई, जिसने समाज की सदियों पुरानी सोच को आईना दिखा दिया। जहां अक्सर बेटियों को अंतिम संस्कार जैसे संस्कारों से दूर रखा जाता है, वहीं तीन बेटियों ने अपने पिता के लिए वह फर्ज निभाया, जिसे निभाने से समाज ने उन्हें हमेशा रोका था।

65 वर्षीय दुर्गा सहनी के निधन के बाद उनकी तीन बेटियों ने न सिर्फ पिता की अर्थी को अपने कंधों पर उठाया, बल्कि तमाम विरोध और सामाजिक बंदिशों को दरकिनार करते हुए छोटी बेटी पिंकी देवी ने अपने पिता को मुखाग्नि देकर अंतिम विदाई दी। इस भावुक पल ने पूरे इलाके को झकझोर दिया और बेटियों के हौसले की हर तरफ सराहना होने लगी।

घोसौत गांव के वार्ड संख्या-9 निवासी दुर्गा सहनी का मंगलवार सुबह निधन हो गया था। उनके घर में कोई बेटा नहीं था। उनकी दुनिया उनकी तीन बेटियां थीं, जिन्होंने पिता के अंतिम समय में बेटे का फर्ज निभाने का संकल्प लिया। पिता की मौत के बाद बेटियों और नाती ने मिलकर अंतिम संस्कार की पूरी जिम्मेदारी संभाली।

लेकिन इस सफर में भी उन्हें सामाजिक विरोध और रिश्तों की कड़वाहट का सामना करना पड़ा। बताया गया कि दुर्गा सहनी का कुछ पट्टीदारों से संपत्ति और पारिवारिक विवाद चल रहा था। जैसे ही बेटियों ने पिता के अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू की, कुछ पट्टीदारों ने बेटी द्वारा मुखाग्नि देने का विरोध शुरू कर दिया।विरोध इतना बढ़ गया कि मौके पर तनाव की स्थिति पैदा हो गई। बहस के बीच धक्का-मुक्की तक की नौबत आ गई। लेकिन बेटियों ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने साफ कर दिया कि जिस पिता ने उन्हें जन्म दिया, प्यार दिया और जिंदगी भर उनका सहारा बने, उनकी आखिरी विदाई का अधिकार भी उन्हें ही है।

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मामले की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय मुखिया मौके पर पहुंचे और लोगों को समझाया कि बेटियों को भी अपने माता-पिता के अंतिम संस्कार का पूरा अधिकार है। समझाने के बाद मामला शांत हुआ।इसके बाद तीनों बेटियों ने अपने नाती के साथ मिलकर पिता की अर्थी को कंधा दिया। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद कई लोगों की आंखें नम हो गईं। श्मशान घाट पहुंचने के बाद छोटी बेटी पिंकी देवी ने नम आंखों से अपने पिता को मुखाग्नि दी।सबसे दर्दनाक बात यह रही कि जिन पट्टीदारों ने विरोध किया, वे अंतिम यात्रा में शामिल तक नहीं हुए। लेकिन बेटियों ने अपने फर्ज से पीछे हटने से इनकार कर दिया। उन्होंने साबित कर दिया कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं होतीं।घोसौत गांव की यह घटना सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि समाज के लिए एक बड़ा पैगाम है। यह उन पुरानी सोच पर सवाल खड़ा करती है, जिसमें बेटियों को अधिकारों से वंचित रखा जाता रहा है।

आज जब बेटियां हर क्षेत्र में अपनी काबिलियत साबित कर रही हैं, तब मुजफ्फरपुर की इन बेटियों ने अपने साहस और संवेदनशीलता से एक नई मिसाल कायम की है। उन्होंने दिखा दिया कि असली रिश्ता जन्म से नहीं, बल्कि दिल से निभाया जाता है। पिता की आखिरी यात्रा में बेटियों ने जो फर्ज निभाया, वह हमेशा समाज के लिए प्रेरणा बना रहेगा।

रिपोर्ट- मणिभूषण शर्मा