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Sharda Sinha : ऑडिशन में शारदा सिन्हा हो गई थी रिजेक्ट, तय किया अब कभी नहीं गाऊंगी, फिर मान ली पति की बात और बेगम अख्तर का मिला आशीर्वाद

वरिष्ठ पत्रकार निराला ने शारदा सिन्हा से उनकी बातचीत का एक अंश डालते हुए बताया है कि कैसे लखनऊ में जब शारदा सिन्हा ऑडिशन देने गई तो उन्हें सुनते ही रिजेक्ट कर दिया गया. उससे शारदा सिन्हा ऐसी टूटी कि वह हमेशा के लिए गाना छोड़ देना चाहती थी. लेकिन फिर

Sharda Sinha
Sharda Sinha- फोटो : news4nation

Sharda Sinha : बिहार कोकिला शारदा सिन्हा का मंगलवार रात निधन हो गया. उनके निधन उपरांत शारदा सिन्हा से जुड़े कई स्मृतियों को सोशल मिडिया पर पत्रकारों, लेखकों, साहित्यकारों और उनके प्रशंसकों द्वारा याद किया जा रहा है. इसी क्रम में वरिष्ठ पत्रकार निराला ने शारदा सिन्हा से उनकी बातचीत का एक अंश डालते हुए बताया है कि कैसे लखनऊ में जब शारदा सिन्हा ऑडिशन देने गई तो उन्हें सुनते ही रिजेक्ट कर दिया गया. उससे शारदा सिन्हा ऐसी टूटी कि वह हमेशा के लिए गाना छोड़ देना चाहती थी. लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि कमाल हो गया और मशहूर गायिका बेगम अख्तर का आशीर्वाद भी मिला. बेगम अख्तर ने तब शारदा सिन्हा को कहा था कि तुम बहुत आगे जाओगी. 

निराला लिखते कि शारदा सिन्हा ने उन्हें बताया था - ''क्लासिकल गीत-संगीत में रुचि तो थी ही. संगीत से प्रभाकर कर रही थी. मणिपुरी नृत्य का प्रशिक्षण भी ले रही थी. नृत्य में ही ज्यादा मन लगता था. इसी बीच मेरी शादी डाॅ बीके सिन्हा से हो गयी. शादी के बाद हम समस्तीपुर में थे. तब ग्रुप के कुछ हम उम्र साथी मिलकर दिन-रात गाना गाने की जुगत में लगे रहते थे. अखबार में एक इश्तेहार आया कि लखनउ में टैलेंट सर्च चल रहा है. हमने अपने पति बीके सिन्हा से बात की तो वे चलने को तैयार हो गये. यह 1971 की बात है. पैसे हमारे पार पर्याप्त थे नहीं फिर भी हम लखनउ के लिए निकल गये. 

शारदा सिन्हा ने बताया था कि ट्रेन से उतरकर सीधे एचएमवी कंपनी के आॅडिशन सेंटर पर पहुंचे. काफी भीड़ थी. जहीर अहमद रिकाॅर्डिंग इंचार्ज थे जबकि मुकेश साहब के रामायण एलबम में संगीत देनेवाले मुरली मनोहर स्वरूप संगीत निर्देशक. नेक्स्ट-नेक्स्ट कर प्रतिभागियों को बुलाया जा रहा था. आखिरी में मैं पहुंची और जाकर बोली कि गाना गाउंगी. जहीर अहमद ने मेरी आवाज में यह एक वाक्य सुनते ही कहा कि नहीं जाओ, तेरी आवाज ठीक नहीं है. एक सिरे से खारिज कर दी गयी मैं. समस्तीपुर से भागे-भागे लखनउ पहुंची थी, बेहद निराश हो गयी. सोच ली कि जब रिजेक्ट ही कर दी गयी मेरी आवाज तो अब कभी नहीं गाउंगी. उस रोज लखनउ अमीनाबाद पहुंचकर जितना कुल्फी खा सकती थी, खायी. मैं अपने आवाज को एकदम से बिगाड़ देने की जिद के साथ कुल्फी खाये जा रही थी कि अब तो गाना ही नहीं है. 

शारदा सिन्हा ने कहा था कि उस रात में हम एक होटल में रूके. बीके सिन्हा ने कहा कि एक बार और बात करेंगे, ऐसे कैसे लौट कर चले जायेंगे. खैर! तय हुआ कि सुबह चलेंगे मिलने. अगली सुबह हम फिर बर्लिंगटन होटल के कमरा नंबर 11 में बने एचएमवी के टेंपोररी स्टूडियो में पहुंचे. इस बार मेरे पति बीके सिन्हा ने संगीत निर्देशक मुरली मनोहर स्वरूप से अनुरोध किया कि मेरी पत्नी गाना गाती हैं, पांच मिनट का समय दे दीजिए. मुरली मनोहर जी तैयार हो गये. माइक पर पहुंची तो ढोलक पर संगत कर रहे अजीमजी ने मजाक करते हुए कहा कि शारदा कल तो चल नहीं पायी थी, आज शुरू करने से पहले जरा दस पैसा माइक पर चढ़ा दो ताकि नेग बन जाये. 

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शारदा सिन्हा सामने देखी तो आॅडिशन लेने के लिए कोई महिला बैठी हुई थी. मैं क्या गाउं, यह तय नहीं कर पा रही थी. लोक संगीत के नाम पर मुझे दो गीत याद थे, जो अपनी भौजाई से सीखी थी अपने दूसरे भाई की शादी में गाने के लिए. एक द्वार छेंकाई का गीत सीखी थी ताकि भाई के शादी में द्वार छेंकूंगी तो कुछ पैसे मिलेंगे और दूसरा गीत कन्यादान का था. मैं वही गीत गाना शुरू की- द्वार के छेंकाई ए दुलरूआ भइया हो...जब मैं इस गीत को गा रही थी, तब तक एचएमवी के जीएम केके दुबे भी वहां पहुंच चुके थे. गीत खत्म होते ही केके दुबे ने कहा- मस्ट रिकाॅर्ड दिस आर्टिस्ट. और वह महिला जो, आॅडिशन जज के रूप में बैठी हुई थी, पास बुलाकर सर पर हाथ फेरते हुए बोली- बहुत आगे जाओगी, बस रियाज किया करो. मुझे बाद में पता चला कि वह महिला कोई और नहीं बल्कि बेगम अख्तर थीं, जिनकी आज मैं सबसे बड़ी फैन हूं. मेरे गीत रिकाॅर्ड हो गये.''

 लेखक  : वरिष्ठ पत्रकार निराला