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Muharram 2026: गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल! बिना मुस्लिम आबादी के गांव में निकलता है मुहर्रम का ताजिया

Muharram 2026: गया के फतेहपुर प्रखंड में 60 गांवों के हिंदू परिवार कई पीढ़ियों से मुहर्रम मना रहे हैं। कई गांवों में मुस्लिम परिवार नहीं होने के बावजूद ताजिया और जुलूस की परंपरा आज भी कायम है।

 Muharram 2026

 Muharram 2026: गया जिले के फतेहपुर प्रखंड में मुहर्रम का पर्व सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे की एक खूबसूरत मिसाल बन चुका है। यहां करीब 60 गांवों में हिंदू परिवार कई पीढ़ियों से पूरे सम्मान, आस्था और परंपरा के साथ मुहर्रम मनाते आ रहे हैं। सबसे खास बात यह है कि इनमें कई ऐसे गांव भी हैं जहां एक भी मुस्लिम परिवार नहीं रहता, फिर भी वहां मुहर्रम की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

गदहियाटांड़, जेहलीबीघा, बहेरा, मोरवे, मतासो, कोड़या, भगवानपुर, खजूरी, केंदुआ, रक्सी, सतनियां, केवाल, सलैयाखुर्द, राजाबीघा, पतेया, पकरिया, जसपुर और मेयारी समेत कई गांवों में हिंदू परिवार ताजिया बनवाते हैं और हर साल परंपरागत तरीके से मुहर्रम मनाते हैं। इन गांवों में लोग पूरे सम्मान के साथ ताजिया निकालते हैं और आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

इमामबाड़ों में फातिहा

कई गांवों में पूर्वजों द्वारा बनवाए गए इमामबाड़े आज भी मौजूद हैं। मुहर्रम के दौरान इन इमामबाड़ों में फातिहा और दूसरे धार्मिक कार्यक्रम करवाए जाते हैं। इसके लिए मौलानाओं को बुलाया जाता है ताकि परंपरा सही तरीके से निभाई जा सके। इस साल फतेहपुर प्रखंड में मुहर्रम के मौके पर 103 समितियों ने लाइसेंस के लिए आवेदन दिया है। पिछले साल यह संख्या 106 थी। पिछले वर्ष जारी हुए 106 लाइसेंसों में लगभग 60 लाइसेंस हिंदू परिवारों और समितियों के नाम पर थे। यह बताता है कि इस पर्व में सभी समुदायों की बराबर भागीदारी है।

गांव में कोई मुस्लिम परिवार नहीं

पतेया गांव के नरेश पंडित बताते हैं कि उनके गांव में कोई मुस्लिम परिवार नहीं रहता, लेकिन कई पीढ़ियों से मुहर्रम मनाने की परंपरा जारी है। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वजों के समय परिवार पर बड़ा संकट आया था। उस समय इमामबाड़े में मन्नत मांगी गई थी। जब संकट दूर हो गया, तब से उनका परिवार हर साल मुहर्रम मनाता आ रहा है। गदहियाटांड़ गांव के रोहन राजवंशी कहते हैं कि उनके पूर्वजों ने इस परंपरा की शुरुआत की थी और आज भी गांव के लोग इसे पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं। उन्होंने बताया कि ताजिया बनाने से लेकर जुलूस निकालने तक गांव के सभी लोग मिलकर आयोजन को सफल बनाते हैं।

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मुहर्रम भाईचारे और सामाजिक एकता का प्रतीक

बहेरा गांव के योगेंद्र पासवान का कहना है कि मुहर्रम सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि भाईचारे और सामाजिक एकता का प्रतीक है। उनके अनुसार गांव के लोग मिलकर ताजिया बनवाते हैं और आयोजन के दौरान सभी धर्मों के लोग एक-दूसरे का पूरा सहयोग करते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि यह परंपरा सिर्फ आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में प्रेम, सम्मान और आपसी सद्भाव को मजबूत करती है। फतेहपुर की यह अनोखी परंपरा आज भी पूरे क्षेत्र में सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की मिसाल बनी हुई है।