LATEST NEWS

  • Mokama-Bakhtiyarpur Four-Lane Accident
  • मोकामा-बख्तियारपुर फोरलेन पर भीषण सड़क हादसा, ट्रक चालक की मौत, इन सबकी हालत गंभीर

  • बगहा को जल्द ही हर साल आने वाले बाढ़ से मिलेगी निजात, गंडक नदी से गाद निकालने और 80 किमी लंबे तटबंध निर्माण को मिली प्रशासनिक स्वीकृति
  • बगहा को जल्द ही हर साल आने वाले बाढ़ से मिलेगी निजात, गंडक नदी से गाद निकालने और

  • Hardeep Singh Puri
  • एमएलसी चुनाव में मिली जोरदार जीत तो राज्यसभा उपचुनाव के लिए भाजपा ने हरदीप सिंह पुरी को बनाया

  • diwali bonus
  • Diwali bonus: कर्मचारियों को कितना बोनस मिलना जरूरी? जानें नियम, न्यूनतम रकम और शिकायत का तरीका

  • DA Hike 2026
  • DA Hike 2026: केंद्रीय कर्मचारियों का महंगाई भत्ता 63 फीसदी होने की उम्मीद, जानें सैलरी और एरियर का

Tile houses in Bihar: खपरैल के घर भारतीय वास्तुकला की प्राचीन धरोहर, बिहार से जुड़ा रहा है समृद्ध इतिहास

खपरैल के घर भारतीय वास्तुकला की एक ऐसी धरोहर हैं, जिन्हें संजोकर रखने की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस प्राचीन ज्ञान और संस्कृति से परिचित हो सकें।

Tile houses in Bihar
Tile houses in Bihar- फोटो : news4nation

खपरैल के घर भारतीय ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। इन घरों की छतें मिट्टी से बनी टाइलों से बनाई जाती थीं, जिन्हें खपरैल कहा जाता है। इस पारंपरिक निर्माण शैली का इतिहास सदियों पुराना है, जो न केवल भारतीय ग्रामीण जीवन की सादगी और प्रकृति से जुड़ाव को दर्शाता है, बल्कि मौसम के साथ तालमेल बैठाने वाली प्राचीन ज्ञान की भी गवाही देता है। खपरैल के घरों की संरचना और उनकी विशेषताएं समय के साथ लोककथाओं और पौराणिक मान्यताओं का हिस्सा भी बनी हैं।

खपरैल की पौराणिक और ऐतिहासिक मान्यताएं

1. प्राचीन संरचनाओं का हिस्सा : खपरैल की छतों का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 3300–1300 ईसा पूर्व) तक जाता है। प्राचीन काल में मिट्टी की ईंटों और खपरैल का उपयोग मुख्य रूप से मकानों के निर्माण में होता था। इसके अवशेष हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में मिले हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह निर्माण शैली भारत की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक का हिस्सा रही है।

2. वास्तुशास्त्र में मान्यता : भारतीय वास्तुशास्त्र में खपरैल के घरों को प्राकृतिक ऊर्जा का संतुलन बनाए रखने वाला माना जाता था। इन घरों की छतें गर्मी और ठंडक को संतुलित रखने में मदद करती थीं, जिससे घर के भीतर का तापमान प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रहता था। गर्मियों में खपरैल की छतें घर के भीतर ठंडक बनाए रखती थीं, जबकि सर्दियों में यह छतें घर को गर्म बनाए रखने में सहायक होती थीं। इस प्रकार, खपरैल के घरों को वास्तुशास्त्र के अनुसार प्राकृतिक ऊर्जा का संरक्षण करने वाला माना जाता था।

3. पौराणिक संदर्भ : कुछ पौराणिक कथाओं में खपरैल की छतों वाले घरों को सौभाग्य का प्रतीक माना गया है। भारतीय ग्रामीण समाज में इन्हें स्थिरता और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता था। इन घरों को देवी-देवताओं के आशीर्वाद से युक्त और हनुमान जी की कृपा से संरक्षित समझा जाता था। विशेषकर बंदरों का खपरैल की छतों पर खेलना धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक भी माना जाता था।

NSIT
Nsmch

खपरैल के घरों की उत्पत्ति और विकास

खपरैल की छतों का प्राचीन इतिहास वैश्विक स्तर पर भी देखने को मिलता है। यह निर्माण शैली न केवल भारत में, बल्कि प्राचीन मेसोपोटामिया, मिस्र, ग्रीस और रोम की सभ्यताओं में भी प्रचलित थी। भारत में इसका प्रमुख विकास ग्रामीण क्षेत्रों में हुआ, जहां मिट्टी, चूना और घास-फूस जैसी प्राकृतिक सामग्रियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थीं। हड़प्पा सभ्यता के दौरान (3000–1500 ईसा पूर्व) से ही खपरैल का उपयोग शुरू हो गया था और यह निर्माण शैली धीरे-धीरे पूरे भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में फैल गई।

भारतीय ग्रामीण जीवन में खपरैल के घर

खपरैल के घर भारतीय ग्रामीण जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। ये घर अपनी साधारण संरचना और पर्यावरण के अनुकूल विशेषताओं के कारण लोकप्रिय थे। इन घरों की नींव आमतौर पर 30 इंच मोटी मिट्टी की दीवारों पर आधारित होती थी, जो घर को मजबूती प्रदान करती थी और मौसम के प्रभाव से बचाती थी। इन घरों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि ये गर्मियों में ठंडे और सर्दियों में गर्म रहते थे, जिससे ये मौसम की चरम स्थितियों में भी आरामदायक होते थे।

बंदर और खपरैल

भारतीय ग्रामीण जीवन की एक विशिष्ट छवि है, जिसमें बंदर खपरैल की छतों पर खेलते दिखाई देते हैं। यह दृश्य न केवल ग्रामीण जीवन की मासूमियत को दर्शाता है, बल्कि इसमें एक पौराणिक संदर्भ भी है। हिंदू धर्म में बंदरों को भगवान हनुमान का रूप माना जाता है, और उनका छतों पर खेलना गांववासियों के लिए शुभ संकेत समझा जाता था। हालांकि, यह कभी-कभी छत को नुकसान पहुंचा सकता था, लेकिन इसे एक धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव के रूप में देखा जाता था।

खपरैल का निर्माण और उसकी चुनौतियां

खपरैल के घरों का निर्माण एक विशेष प्रकार की तकनीक से किया जाता था। मिट्टी, चूना, और घास-फूस जैसी प्राकृतिक सामग्रियों से बने ये घर पर्यावरण के अनुकूल होते थे। ये निर्माण सामग्री न केवल सस्ती होती थी, बल्कि स्थानीय रूप से भी उपलब्ध होती थी, जिससे कारीगरों को रोजगार मिलता था। हालांकि, खपरैल के घरों में कुछ चुनौतियां भी थीं, जैसे बारिश के दौरान छत से पानी का रिसाव होना और जानवरों, विशेषकर बंदरों द्वारा छत को नुकसान पहुंचाना।

आधुनिकता के साथ खपरैल का लोप

आज के आधुनिक युग में खपरैल के घरों का स्थान कंक्रीट और सीमेंट से बने घरों ने ले लिया है। आधुनिक घर न केवल अधिक टिकाऊ होते हैं, बल्कि बारिश और जानवरों से होने वाली क्षति से भी सुरक्षित रहते हैं। लेकिन इसके साथ ही खपरैल के घर बनाने की कला और इस काम से जुड़े कारीगर भी धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं। यह पारंपरिक निर्माण शैली अब इतिहास का हिस्सा बनती जा रही है, और आधुनिक पीढ़ी इसे अनुभव करने से वंचित रह सकती है।

खपरैल के फायदे और नुकसान

फायदे: 

1. पर्यावरण के अनुकूल निर्माण – खपरैल के घरों का निर्माण प्राकृतिक संसाधनों से होता था, जो पर्यावरण के अनुकूल होते थे।

2. मौसम के अनुसार आराम – गर्मियों में घर ठंडे और सर्दियों में गर्म रहते थे।

3. स्थानीय रोजगार – इस निर्माण शैली से स्थानीय कारीगरों को रोजगार मिलता था।

4. सस्ती सामग्री – निर्माण सामग्री स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध और सस्ती होती थी।

नुकसान:

1. बारिश में रिसाव – खपरैल की छतों से बारिश के मौसम में पानी का रिसाव हो सकता था।

2. जानवरों द्वारा क्षति – बंदर और अन्य जानवरों द्वारा छतों को नुकसान पहुंचाना आम था।

3. कम स्थायित्व – आधुनिक घरों की तुलना में खपरैल के घर कम टिकाऊ होते थे।

खपरैल के घर भारतीय संस्कृति और ग्रामीण जीवन की एक महत्वपूर्ण धरोहर हैं। ये घर न केवल कारीगरों की कुशलता को दर्शाते थे, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने की परंपरा को भी आगे बढ़ाते थे। हालांकि, आधुनिकता के साथ इन घरों और इन्हें बनाने की कला का धीरे-धीरे लोप हो रहा है। खपरैल के घर भारतीय वास्तुकला की एक ऐसी धरोहर हैं, जिन्हें संजोकर रखने की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस प्राचीन ज्ञान और संस्कृति से परिचित हो सकें।

कमलेश की रिपोर्ट