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Bihar Inter Exam: एक मिनट की देर, एक साल का दर्द, इंटर परीक्षा के पहले दिन सख्ती ने कुचल दिए मासूम के ख़्वाब

Bihar Inter Exam: सुबह की ठंडी हवा में जहां कुछ छात्राएं कॉपी-कलम संभालकर उम्मीदों के साथ परीक्षा केंद्र में दाख़िल हुईं, वहीं कई छात्राओं के लिए महज एक से चार मिनट की देरी जिंदगी भर का घाव बन गई।...

One Minute Late One Year Lost Inter Exam Strictness Shatters
इंटर परीक्षा के पहले दिन सख्ती ने कुचल दिए मासूम के ख़्वाब- फोटो : reporter

Bihar Inter Exam: बिहार में इंटरमीडिएट परीक्षा का पहला दिन इम्तिहान से ज़्यादा इम्तिहान-ए-सबर बन गया। सुबह की ठंडी हवा में जहां कुछ छात्राएं कॉपी-कलम संभालकर उम्मीदों के साथ परीक्षा केंद्र में दाख़िल हुईं, वहीं कई छात्राओं के लिए महज एक से चार मिनट की देरी जिंदगी भर का घाव बन गई। भागलपुर के मारवाड़ी पाठशाला और सूरज देवी मिश्रीलाल परीक्षा केंद्र समेत कई केंद्रों पर सुबह 9 बजे के बाद गेट बंद कर दिए गए और उसके साथ ही सैकड़ों आंखों में पल रहे सपनों पर ताला जड़ दिया गया।

गेट के बाहर का मंजर दिल को झकझोर देने वाला था। रोती-बिलखती छात्राएं, कांपती आवाज़ में रहम की गुहार लगाती रहीं। किसी की आंखों से आंसू थम नहीं रहे थे, किसी के होंठों पर बस एक ही सवाल था-सर, बस एक मिनट देर हो गई।... परिजन भी बेबस थे, कोई बेटी का सिर सीने से लगाकर ढांढस बंधा रहा था, तो कोई हाथ जोड़कर अफसरों से इंसाफ की भीख मांग रहा था। मगर क़ायदे-क़ानून की सख़्त दीवार इतनी ऊंची निकली कि संवेदना की कोई खिड़की खुल न सकी।

देरी से पहुंचीं छात्राओं ने मजिस्ट्रेट और पुलिसकर्मियों के सामने इल्तिजा, मिन्नत और वादा सब कुछ आजमा लिया। किसी ने कहा कि बस ट्रैफिक में फंस गई, किसी ने बताया कि रास्ते में साधन नहीं मिला। किसी ने दोबारा गलती न करने की कसम खाई, मगर जवाब एक ही रहा-“नियम है, इजाज़त नहीं।” सवाल यह है कि क्या नियम इतने बे-रहम हो गए हैं कि एक मिनट की चूक पूरे साल की मेहनत को राख कर दे?

आज भागलपुर में 59 परीक्षा केंद्रों पर इंटर परीक्षा आयोजित हो रही है, जिसमें 44 हजार 644 परीक्षार्थी शामिल हैं। पहली पाली में बायोलॉजी और दूसरी पाली में फिलॉसफी की परीक्षा थी। लेकिन किताबों के सवालों से पहले, कई छात्राओं को जिंदगी के सबसे कठोर सवाल का सामना करना पड़ा क्या शिक्षा व्यवस्था में अनुशासन के साथ इंसानियत की भी कोई जगह बची है?

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पहले दिन की यह सख्ती उन चेहरों पर लिखे दर्द की तरह है, जो शायद समय के साथ फीके पड़ जाएं, मगर दिलों पर बना एक साल का ज़ख़्म लंबे अरसे तक टीस देता रहेगा।

रिपोर्ट - अंजनी कुमार कश्यप