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Bihar Agricultural University: जीरो टॉलरेंस या जीरो एक्शन? 35 करोड़ के कथित घोटाले पर कैग की रिपोर्ट के बाद भी खामोशी, सांसद ने PM से की दखल की मांग

Bihar Agricultural University: सांसद सुधाकर सिंह ने बिहार कृषि विश्वविद्यालय में कथित तौर पर करोड़ों रुपये की वित्तीय अनियमितताओं को लेकर सीधे प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है।..

Bihar Agricultural University: जीरो टॉलरेंस या जीरो एक्शन? 3
कैग की रिपोर्ट के बाद भी खामोशी- फोटो : SOCIAL MEDIA

Bihar Agricultural University: बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का दावा एक बार फिर सवालों के घेरे में है। वजह है बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर से जुड़ा वह मामला, जिसने सियासी गलियारों से लेकर शैक्षणिक जगत तक हलचल मचा दी है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में कथित तौर पर करोड़ों रुपये की वित्तीय अनियमितताओं, नियुक्ति घोटाले, खरीद प्रक्रिया में गड़बड़ी, प्रोन्नति में मनमानी और निर्माण कार्यों में नियमों की अनदेखी जैसे गंभीर आरोपों का उल्लेख होने के बावजूद अब तक किसी बड़ी कार्रवाई का न होना चर्चा का विषय बन गया है।

बक्सर के सांसद सुधाकर सिंह ने इस पूरे मामले को लेकर सीधे प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है। सांसद का आरोप है कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में वर्षों से चली आ रही अनियमितताओं ने संस्थान की साख को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने अपने पत्र में कहा है कि कैग की विस्तृत रिपोर्ट में विश्वविद्यालय प्रशासन और शीर्ष अधिकारियों की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, लेकिन जिम्मेदार लोगों के खिलाफ अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।सियासी हलकों में चर्चा है कि जब कैग जैसी संवैधानिक संस्था की रिपोर्ट में कथित अनियमितताओं का उल्लेख हो चुका है, तो फिर कार्रवाई की रफ्तार इतनी सुस्त क्यों है? यही सवाल अब विपक्ष भी उठा रहा है। सांसद सुधाकर सिंह का कहना है कि यदि भ्रष्टाचार के मामलों में सरकार वास्तव में "जीरो टॉलरेंस" की नीति पर चल रही है, तो फिर इस मामले में जवाबदेही तय करने में देरी क्यों हो रही है।

जानकारी के अनुसार सांसद इससे पहले बिहार के राज्यपाल से भी मुलाकात कर पूरे मामले का विस्तृत परिवाद और दस्तावेज सौंप चुके हैं। राजभवन को कई बार शिकायतें, दस्तावेज और कथित साक्ष्य उपलब्ध कराए गए। सूत्रों के मुताबिक कुछ मामलों में विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाब भी मांगा गया था, लेकिन जवाब देने में देरी और प्रक्रिया के लंबित रहने से सवाल और गहरे हो गए हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला अब केवल विश्वविद्यालय प्रशासन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी छवि से भी जुड़ गया है। विपक्ष इसे सरकार की कथनी और करनी के अंतर के उदाहरण के रूप में पेश कर रहा है। वहीं सामाजिक संगठनों और शिक्षाविदों का एक वर्ग भी मामले की निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई की मांग कर रहा है।

कैग रिपोर्ट में जिन बिंदुओं को लेकर सवाल उठाए गए हैं, उनमें कथित तौर पर नियुक्तियों में अनियमितता, निविदा प्रक्रिया में गड़बड़ी, वित्तीय प्रबंधन में त्रुटियां, निर्माण कार्यों में नियमों की अनदेखी और छात्र नामांकन से जुड़े विवाद शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष किसी सक्षम जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।

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रिपोर्ट-चंद्रशेखर भगत