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मानसून सत्र में सियासी संग्राम तय! परिसीमन, महिला आरक्षण और वन नेशन-वन इलेक्शन पर सत्ता-विपक्ष आमने-सामने, बहुमत की कसौटी पर मोदी सरकार

Parliament Monsoon Session: संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने जा रहा है और इस बार सदन में सिर्फ कानून नहीं, बल्कि सियासी इम्तिहान भी होगा। ...

Stormy Monsoon Session  Govt Opposition Set for Big Showdown
महिला आरक्षण और वन नेशन-वन इलेक्शन पर सत्ता-विपक्ष आमने-सामने- फोटो : reporter

Parliament Monsoon Session: संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने जा रहा है और इस बार सदन में सिर्फ कानून नहीं, बल्कि सियासी इम्तिहान भी होगा। केंद्र की एनडीए सरकार कई बड़े संवैधानिक संशोधन विधेयकों को पेश करने की तैयारी में है, जिनमें लोकसभा सीटों के परिसीमन, महिला आरक्षण कानून के अमल और 'वन नेशन, वन इलेक्शन' जैसे अहम प्रस्ताव शामिल हैं। इन मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच ज़बरदस्त जुबानी जंग और सियासी घमासान के आसार हैं।

संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी संविधान संशोधन को सिर्फ साधारण बहुमत से मंजूरी नहीं मिल सकती। अनुच्छेद 368 के तहत लोकसभा और राज्यसभा दोनों में कुल सदस्य संख्या के बहुमत के साथ उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की दरकार होती है। पूर्व लोकसभा महासचिव पीडीटी आचार्य का मानना है कि जब तक सरकार अपने संख्या बल को लेकर पूरी तरह मुतमइन नहीं होगी, तब तक ऐसे अहम विधेयकों को आगे बढ़ाना आसान नहीं होगा।

सरकार का सबसे बड़ा दांव 131वां संविधान संशोधन विधेयक माना जा रहा है। इसके तहत लोकसभा की निर्वाचित सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर करीब 850 करने और लंबे समय से लंबित परिसीमन प्रक्रिया शुरू करने का प्रस्ताव है। हालांकि दक्षिण भारत के कई राज्यों ने इसे अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व के खिलाफ बताते हुए पहले ही एतराज़ जता दिया है। उनका कहना है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता की सजा उन्हें कम सीटों के रूप में नहीं मिलनी चाहिए।

इसी सत्र में नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने की दिशा में भी सरकार कदम बढ़ा सकती है। यह कानून लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का रास्ता खोलता है। इसके अलावा 129वां संविधान संशोधन विधेयक यानी 'वन नेशन, वन इलेक्शन' भी सरकार की प्राथमिकता में शामिल है, जिसके जरिए लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की कवायद तेज होगी।

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संसद में 130वें संविधान संशोधन विधेयक पर भी निगाहें टिकी रहेंगी। इसमें किसी आपराधिक मामले में दोषसिद्ध होकर जेल जाने वाले प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री को 30 दिनों के भीतर पद छोड़ना अनिवार्य करने का प्रस्ताव है। वहीं विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम में संशोधन कर विदेशी फंडिंग पर निगरानी और सख्त करने की तैयारी भी सरकार ने कर ली है, जिसे लेकर विपक्ष नागरिक संस्थाओं पर बढ़ती निगरानी का आरोप लगा रहा है।

राजनीतिक लिहाज़ से इस बार एनडीए पहले से मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहा है। लोकसभा में गठबंधन का संख्या बल बढ़कर करीब 348 सांसदों तक पहुंचने का अनुमान है, लेकिन संविधान संशोधन के लिए आवश्यक 360 वोटों से वह अभी भी कुछ कदम दूर है। राज्यसभा में भी एनडीए की स्थिति मजबूत हुई है, फिर भी दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा हासिल करना चुनौती बना हुआ है।ऐसे में साफ है कि मानसून सत्र सिर्फ विधायी कार्यवाही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह सत्ता और विपक्ष के बीच राजनीतिक ताकत, रणनीति और संख्या बल की असली परीक्षा साबित हो सकता है। पूरे देश की निगाहें अब संसद पर टिकी हैं, जहां हर बहस और हर वोट आने वाले वर्षों की सियासत की दिशा तय कर सकता है।