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Student Movement: नीट के जख्म, दो बेटियों की खामोश चीख, अधूरे सपनों की कौन सुनेगा चित्कार, टूटे सवप्न से बिखर गया परिवार, इंसाफ की पुकार से गूंज रहा देश

Student Movement: दो होनहार बेटियां आकांक्षा उर्फ स्नेहा चतुर्वेदी और अवंतिका मौर्य की मौत ने पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया।सीवान में पुलिस के एके47 की गोली 3 छात्रों के गंभीर घायल होने ने भी सवाल खड़ा किया है...

NEET Row Returns to Parliament as Students Demand Justice Ag
सवाल सिर्फ परीक्षा का नहीं, भरोसे का है- फोटो : social Media

Student Movement: नीट पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था पर उठे सवालों ने सिर्फ संसद और सियासत के गलियारों में हलचल नहीं मचाई, बल्कि कई घरों की खुशियों को मातम में बदल दिया। डॉक्टर बनने का सपना आंखों में सजाए बैठी दो बेटियां अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी खामोश आवाज आज भी इंसाफ की गुहार लगा रही है। कभी जिन घरों में बेटियों की हंसी गूंजती थी, वहां अब सिर्फ यादों का सन्नाटा और दर्द की परछाइयां रह गई हैं।जंतर-मंतर पर छात्रों की आवाज भले ही आंदोलन के रूप में उठी थी, लेकिन उसकी गूंज उन परिवारों तक पहुंची, जिन्होंने अपनी औलाद को खो दिया। इन परिवारों के लिए यह सिर्फ एक परीक्षा विवाद नहीं, बल्कि जिंदगी भर का ऐसा जख्म है, जिसकी टीस शायद कभी खत्म नहीं होगी।

नीट विवाद को लेकर छात्रों का आंदोलन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद भले ही शांत हो गया हो, लेकिन सियासी घमासान अभी भी जारी है। विपक्ष इस मुद्दे को संसद में उठाने की तैयारी कर रहा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि न्याय, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहे छात्रों के साथ सख्ती बरती गई। प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस और पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं। बिहार के सीवान में पुलिस ने छात्रों पर एके 47 से गोली दागी जिसमें 3 छात्र जीवन मौत से लड़ाई लड़ रहे है।सीवान ले लोगों की खामोशी में  दर्द का तूफान छिपा है। आखिर इन पुलिसवालों पर क्या कार्रवाई होगी। भरत तिवारी केस में प्रशासन की कथित करनी धीरे धीरे सामने आ गई है। पटना में नीट छात्रा मौत मामले में पुलिस से लेकर सीबीआईतक सब फेल हो गए।

लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे दर्दनाक पहलू उन परिवारों की कहानी है, जिनके सपनों का चिराग बुझ गया। मध्य प्रदेश की दो होनहार बेटियां मऊगंज की आकांक्षा उर्फ स्नेहा चतुर्वेदी और खरगोन की अवंतिका मौर्य की मौत ने पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया। मऊगंज जिले के मगनिया गांव की 18 वर्षीय आकांक्षा उर्फ स्नेहा चतुर्वेदी नागपुर में रहकर नीट-यूजी की तैयारी कर रही थीं। परिवार की उम्मीदें उससे जुड़ी थीं। मां-बाप को भरोसा था कि उनकी बेटी एक दिन डॉक्टर की सफेद कोट पहनकर परिवार का नाम रोशन करेगी।मेहनत, संघर्ष और उम्मीदों के बीच आकांक्षा को अच्छे अंक आने की पूरी आस थी। लेकिन परीक्षा विवाद और भविष्य को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता ने उसके मन पर गहरा असर डाला। परिवार का दावा है कि मानसिक दबाव ने उसे भीतर तक तोड़ दिया।आकांक्षा अपने पीछे एक दर्द भरा संदेश छोड़ गई, जिसमें दोबारा परीक्षा देने की हिम्मत न होने की बात कही गई थी। एक ऐसी बेटी, जिसके हाथों में किताबें थीं और दिल में बड़े अरमान, वह व्यवस्था की उलझनों के अंधेरे में खो गई।

आकांक्षा के पिता कृष्ण कुमार चतुर्वेदी छोटे किसान हैं। बेटी को डॉक्टर बनाने के लिए उन्होंने अपनी क्षमता से बढ़कर संघर्ष किया। कर्ज लिया, खेत गिरवी रखे और बेटी की पढ़ाई के लिए हर संभव कोशिश की। नागपुर में खर्च चलाने के लिए उन्होंने कैटरिंग तक का काम किया।लेकिन वक्त ने ऐसा सितम ढाया कि बेटी भी चली गई और परिवार का सहारा भी टूट गया। बेटी की मौत का सदमा पिता सह नहीं पाए और गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए। आज परिवार के पास सिर्फ यादें बची हैं।आकांक्षा की मां नीलम की आंखों में आज भी वही दर्द दिखाई देता है। उनका सवाल है कि किसी अधिकारी का इस्तीफा उनकी बेटी को वापस नहीं ला सकता। उनका दर्द सिर्फ इतना है कि दोषियों को ऐसी सजा मिले, ताकि किसी और मां की गोद इस तरह सूनी न हो।

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खरगोन की 23 वर्षीय अवंतिका मौर्य भी डॉक्टर बनने का सपना लेकर आगे बढ़ रही थीं। पिता डॉ. बंशी मौर्य की तरह वह भी चिकित्सा क्षेत्र में अपनी पहचान बनाना चाहती थीं। लेकिन नीट विवाद के बाद बढ़े तनाव ने उनके मन को झकझोर दिया।परिवार के अनुसार, अवंतिका धीरे-धीरे खामोश रहने लगी थीं। बातचीत कम हो गई थी, चिंता बढ़ गई थी और तनाव ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया। आखिरकार उन्होंने इंदौर में अपनी जिंदगी खत्म कर ली।

आज अवंतिका की मां बेटी की तस्वीर तक देखने से घबरा जाती हैं। तस्वीरों में मुस्कुराता चेहरा अब परिवार के लिए खुशी नहीं, बल्कि दर्द का आईना बन चुका है। घर की दीवारों पर लगी यादें हर पल उस जख्म को फिर से ताजा कर देती हैं।आकांक्षा और अवंतिका अब लौटकर नहीं आएंगी, लेकिन उनके परिवारों की फरियाद आज भी जिंदा है। सवाल सिर्फ नीट परीक्षा का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है, जिसे करोड़ों छात्र और माता-पिता शिक्षा व्यवस्था पर रखते हैं।

हर साल लाखों युवा अपने सपनों को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। माता-पिता अपनी जमा पूंजी, मेहनत और उम्मीदें बच्चों के भविष्य पर लगा देते हैं। ऐसे में जब परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते हैं तो उसका असर सिर्फ नतीजों पर नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी पर पड़ता है। बिहार के सीवान में जिस पुलिस पर कानून व्यवस्था संभालने की जिम्मेवारी है वहीं कथित तौर पर एके 47 छात्रों पर तान हीं नहीं रही वरन गोली भी दाग रही है। 

अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या ऐसी व्यवस्था बन पाएगी, जहां किसी छात्र का सपना लापरवाही, भ्रष्टाचार या अव्यवस्था की भेंट न चढ़े? क्या आने वाले समय में कोई मां अपनी बेटी की तस्वीर देखकर टूटने को मजबूर नहीं होगी?आकांक्षा और अवंतिका की कहानी सिर्फ दो परिवारों का दर्द नहीं है, बल्कि उन लाखों छात्रों की बेचैनी है जो मेहनत के दम पर अपने मुकाम तक पहुंचना चाहते हैं। अब जरूरत है कि व्यवस्था जवाबदेह बने, ताकि किसी और घर का सपना इस तरह खामोश मौत में तब्दील न हो। ये दर्द बिहार के सीवान के तीन छात्रों के घर परिवार का भी है जिन पर कथित तौर पर पुलिस ने एके 47 से गोली चलाई है।सरकार ये आपके बच्चे हैं. देश के भविष्य हैं आखिर इनकी कौन सुनेगा.....